भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra   आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha   258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/   पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

 

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Thursday, July 17, 2008

पुनः स्मृति

पुनः स्मृति

बितल बर्ख बितल युग,
बितल सहस्राब्दि आब,
मोन पाड़ि थाकल की,
होयत स्मृतिक शाप।

वैह पुनः पुनः घटित,
हारि हमर विजय ओकर,
नहि लेलहुँ पाठ कोनो,
स्मृतिसँ पुनः पुनः।

सभक योग यावत नहि,
होएत गए सम्मिलन,
हारि हमर विजए ओकर,
होएत कखनहु नहि बन्द।

मोनक जड़िमे

मोनक जड़िमे
पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च नञि जानि किए सेजल
मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल।

पर्वत शिखर सोझाँ अबैत हियाऊ गमाबथि,
बल घटल जेकर पार दुःखक सागर करैत।
करबाक सिद्धि सोझाँ छथि जे क्यो विकल,
भोथलाइत प्यासल अरण्यपथ मे हँ बेकल।

मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल,
पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च नञि जानि किए सेजल।

हाथ दए तीर आनि दए करोँट तखन तत,
मनसिक अन्हारक मध्य विचरणहि सतत।
प्रकाशक ओतए कए उत्पत्ति ठामहि तखन,
विपत्तिक पड़ल क्यो आब नञि होएत अबल।

मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल,
पंक्त्तिबद्ध कए पुनः किञ्च जानि किए सेजल।

करबाक अछि लोक कल्याणक मन वचन कर्महि ,
नञि अछि अपन अभिमान छोड़ब अधः पथ ई।
घुरत अभिमान देशक तखन अभिमानी हमहुँ छी,
नञि तँ फुसियेक अभिमान लए करब पुनः की।
मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रमक ई,
पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च जानि कए सेजल छी।

अखण्ड भारत

अखण्ड भारत
धीर वीर छी मातु बेर की,
अबेर होइत सङ्कल्पक क्षण ई,
बुद्धि वर्चसि पर्जन्य बरिसथि,
सभा बिच वाक् निकसथि,
औषधीक बूटी पाकए यथेष्ठा,
अलभ्य लभ्यक योग रक्षा।
आगाँ निश्चयेण कार्यक क्रमक,
पराभव होए सभ शत्रु सभक,
वृद्धि बुद्धिक होऽ नाश शत्रुत्वक,
मित्रक उदय होऽ भरि जगत।
नगर चालन करथि स्त्रीगण,
कृषि सुफल होए करू प्रयत्न।
वृक्ष-जन्तुक संग बढि आब,
ठाढ होऊ नहि भारत भेल साँझ,
दोमू वर्चसिक गाछ झहराऊ पाकल फलानि,
नञि सोचबाक अनुकरणक अछि बेर प्राणी।
वर्चस्व अखण्ड भरतक मनसिक जगतमे,
पूर्ण होएत मनोरथ सभक क्यो छुटत नञि।

सपना

सपना

सपना,
सपना सुन्दर सुन्दर?

नञि, नञि छल ओतेक सुन्दर,
बच्चामे ई खूब डरओलक तोड़ैत,
आँखिसँ छिनैत सुतबाक उत्सुकता ,
जखन मोन उखड़ैत छल घबड़ाइत।

देश कालक सीमा बन्हलहुँ,
पुरखाक भ्रमकेँ अपनओने,
मुदा प्रथम बीजी-पुरुषक छद्म,
नहि छल जाइत मोनक भ्रम।

बचहनक मोनक-छाती धक-धक,
करैत छल खोज जगक जन्मक,
नहि पओने कोनो प्रश्नोत्तर,
छोड़ैत ईश्वर पर ई शाश्वत।

मुदा ईश्वरक मोन आ’ शाश्वत स्वरूपक,
नहि सोझ भेल ससरफानी पड़ल गिरह,
छाती-मोनक करैछ, बढ़ल जे धकधकी,
सपना सेहो नञि, जौँ अबैछ निन्न बेशी।

संसारकेँ सहबाक ईहो अछि प्रहेलिका,
बिनु समस्या समाधानक करैत छी,
हँसैत बिहुँसैत बनबैत सर्वोपरि भाग्यराजकेँ,
करैत छी सभटा अपने, आ’ ई छी कहैत,
कहैत जे हम छी भाग्यराजक कठपुतली।
ईश्वरक ई लीला? अछि मोनक छातीक संग,
भौतिक छातीकेँ सेहो, जे धकधकी ई बढ़बैत।

सपना सुन्दर आकि डरओन नहि कोनो,
अछि आब अबैत।

के छथि

के छथि
के छथि जिनकर हस्त-रेखमे,
अछि परिश्रमसँ बढ़ब लिखल।
के छथि जिनका ललाट मध्य,
परिश्रमक गाथा रहैछ सकल।
जे छथि सुस्त तकरे चमकैत,
अछि हाथक रेखा बुझूँ सखा,
जिनका घाम नहि खसन्हि,
छन्हि ललाट चमकैत,
नहि बेजाय।।

होली

होली
धुरखेलक कादो-माटिसँ रहथि अकच्छ,
रंग अबीर भने आयल मुदा लगैछ टका,
साफ-सुथड़ा बुझैत छलहुँ एकरा मुदा,
निबंध निकलैत अछि रंगक केमिकलक,
विषय अछि पुरनके छल ठीक यौ कका।

दारू पिनहार सोमरसक चर्चा करैत नहि अघाइत छथि,
देवतो पिबैत रहथि ओकरा पुरनका नामसँ,
अछि होली,
मित्रता बढ़ेबासँ बेशी घटा रहल अछि आइ काल्हि ई।

मोन पाड़ैत

मोन पाड़ैत
मोन अछि नहि पड़ि रहल,
पाड़ि रहल छी मोन।
लिखना कड़ची कलमसँ लिखैत,
फेर फाउन्टेन पेनक निबमे बान्हि ताग,
छलहुँ लिखाइकेँ मोटबैत,
मास्टर साहब भ’ जाइथ कनफ्यूज।
केलहुँ अपने अपकार ठाढ़े-ठाढ़,
अक्षर अखनो हमर नहि सुगढ़।
फेर मोन पाड़ैत छी,
दिनमे बौआइत रही,
कलममे बाँझी तकैत,
दोसर ठाढ़ि तोड़ने पड़ैत छल,
बुरबक होयबाक संज्ञा,
ईहो छी नहि बुझैत,
मोजर होइत तँ खैतहुँ आम,
अगिला साल।
बाँझीमे नहि कोनो आस,
घूरमे होइछ मात्र काज।
फेर छे पाड़ैत,
अंडीक बीया बीछब,
पेराइ कटबाय अनैत छलहुँ तेल,
ओहिमे छनल तिलकोड़क स्वाद,
राजधानीक शेफकेँ करैछ मात।
तेलक कमीसँ भभकैत कबइक स्वाद,
’की नीक बनल’ केर मिथ्यावाद।
महिनामे आध किलो करू तेलक खर्च,
भ’ जायत एक किलो,
पाइक माश्चर्ज।
कंजूसी नहि,
जबरदस्ती ठूसी।
मोन पाड़ैत छी धानक खेत,
झिल्ली कचौड़ी,
लोढ़ैत काटल धानक झट्ठा,
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालछड़ी।
‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ’ सतघरियाक खेल,
आमक जाबी,
बंशीसँ मारैत माछ,
खुरचनसँ सोहैत आम काँच।
चूनक संग काँच आमक मीठ स्वाद,
बडका दलान,
दाउन,
बाढ़िक पानि सँ डूबल शीस होइत खखड़ी,
धानमे मिला देला पर पकड़ैत छल कुञ्जड़नी।
भैरव स्थानक काँच बैरक स्वाद,
बिदेसरक रवि दिनक बूझल,
फूल_लोटकीसँ बिदेसर पूजल।
चूड़ा लय जाइत रही गामसँ,
दही-जिलेबी कीनि घुरैत भोजन कय।
जमबोनीक बनसुपारीक स्वाद,
पुरनाहाक धातरीमक गाछ।
साहर दातमनिक सोझ नीक छड़,
जे अनैछ छी बुधियारी तकड़।
तित्ती खेलाइत बाल,
गुल्ली डंटा, गोलीक खेल,
अखराहाक झमेल।
हुक्का लोलीक बाँसक कनसुपती,
फेर कपड़ाक गेनी मटियातेलमे डुबाय,
छलहुँ रहल जराय।
छठिक भोरमे फटक्का फोड़ल,
जूड़िशीतलक धुरखेल खेलेल।
आयल बाढ़ि दुर्भिक्ष,
छोड़ल गाम यौ मित्र।
मोन नहि पड़ैछ,छी पाड़ैत,
बैसि बैसि बैसि।

काल्हि

काल्हि
भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आ’ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकाइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी छुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
बिना उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।

चोरकेँ सिखाबह

चोरकेँ सिखाबह
यौ काका छी अहाँ खाटकेँ,
धोकड़ी किएक बनओने,
खोलि नेवाड़ फेर घोरिकेँ,
बनाऊ खाट फेर नवीने।
कहलन्हि काका तखन जे हौ,
देखह आयत रातिमे जे चोर,
पटकत लाठी खाट पर
आ’ चोट नहि लागत मोर।
परञ्च काका जौँ ओ’ चलबय,
लाठी नीचाँ बाटे,
वाह बेटा कहि दिहह चोरकेँ,
ई गप तोहीँ जा कय।

चोरि

चोरि
गेलहुँ गाम आ’ एम्हर,
आयल फोन,
समाचार चोरिक।
छुट्टी होयबला छल समाप्त,
मुदा चोरक गणना छल ठीक।
आबयसँ एक्के दिन पहिने,
लगेलन्हि घात।
तोड़ि कय केबाड़,
उधेसल घर-बार।
नहि पाबि कोनोटा चीज,
घुरल माथ पीटि।
भोरमे पड़ोसी कएलन्हि डायल सय,
पुलिस आयल हारि थाकि कय।
पड़ोसीसँ किनबाय दू टा अतिरिक्त ताल, (पुलिस महराज अपन घरक हेतु),
चाभी लेलन्हि अपन काबिजमे।
चोर हड़बड़ीमे छल चलि गेल,
मुदा एहि महाशयक हाथ चाभी गेल,
आ’ शो-केशक चानीक नर्त्तकी गुम भेल।
चोरकेँ छल डर गेटक दरबानक,
से छलाह ओ’ गहनाक आ’ नकदीक ताकक।
मुदा पुलिस महाराज दय राब दौब दरबानहुँकेँ,
निकललाह चोरि कय बरजोड़ीसँ।

तक्षशिला

तक्षशिला
तक्षशिला अछि पाकिस्तानमे,
इतिहासक उनटबैत पन्ना,
चक्र घूमल टूटल हमर देश,
अराड़ि ठाढ़ कएलक दियाद।
मुदा सोचैत छी।
जे भने दियाद अछि समीप,
आ’ कएने अछि अराड़ि,
ताहि बहन्ने छी हम सजग,
करैत रहैत छी तैयारी।
1962 धरि हिमालयकेँ बुझल बेढ़,
जेना 1498 धरि छल समुद्र,
द्वार खोलैत छल खैबर दर्रा।
प्ड़ोसीयो पर आक्रमण होइत छल,
दूर-दूरसँ अबैत छल अत्याचारी,
भने दियाद अछि कएने अराड़ि,
जे करैत रहैत छी तैयारी।

बिसरलहुँ फेर

बिसरलहुँ फेर
खूब ठेकनेने जाइत,
जे नहि बिसरब आइ,
मुदा गप्प पर गप्प चलल,
कृत्रिमता गेल ढ़हाइत।
फेर काजक बेर मोन,
नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन,
कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप,
आ’ तकरा बाद मसोसि कय
रहि जाइत छी गुम्म।

वेदपाठी

वेदपाठी
वेद वाक्य परम सत्य,
संस्कृत साहित्य अति उत्तम।
करैत छी अहाँ वक्त्तव्य,
मुदा अहाँ की अहाँक पुरखा,
मरि गेलाह बिन सुनने,
वेद वाक्य,
बिन पढ़ने संस्कृत।
यौ अहाँ नहि पढ़लहुँ अहाँ,
अनका अनधिकार बनेबाक चेष्टा,
कएलहुँ अहाँ।
छी वेदक अप्रेमी,
नहि अछि क्षमता,
वेदक पक्ष की विपक्षमे बजबाक ।
वेद वाक्य सत्य एकरा बनेने छी,
अहाँ फकड़ा।

प्रवासी

प्रवासी
संगहि काटल घास,
महीस संगे चड़ेलहुँ,
पुछैत छी गहूम ई,
पाकत कहिया?
दू दिन दिल्ली गेलहुँ,
सभटा बिसरेलहुँ,
ईहो बिसरि गेलहुँ,
जे धान कटाइछ कहिया।

चित्रपतङ्ग

चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आ’,
खसैत काल नरकक अनुभूति।

रिक्त

रिक्त
पाँचम वर्गसँ सातम वर्गमे,
तड़पि गेल छलहुँ हम।
छट्ठा वर्गक अनुभव अछि रिक्त।
बा’ आ’ बाबा जन्मक पहिनहि,
प्राप्त कएलन्हि मृत्यु,
वात्स्ल्यक अनुभव भेल रिक्त।
माँ एके बहिनि छलि तेँ,
मौसी-मौसाक अनुभवो नहि,
ईहो रहल रिक्त।
क्यो कहैत अछि जे छठामे पढ़ैत छी,
बा’ आ’ बाबाक संग घुमैत छी,
मौसी-मौसाक काज उद्यममे जाइत छी,
तँ हम कहैत छी,
जे ई कोन संबंध,
कोन वर्ग अछि,
छोड़ि सकैत छी।
उत्तर भेटैछ,
अहाँ नहि बुझब।
मुदा नव संबंध,
नब नगर,
नव भाषा,
नवीन पीढ़ीकेँ,
कोना बुझायब, ओ’ कोना बुझत।
ओ’ तँ नहि बूझि सकत काका-काकी,
नहि बूझत दीया-बाती,
खटैत दौड़ैत आ’ नहि घुरि आओत,
ककरा बुझायब आ’ के बूझत।

बुद्ध

बुद्ध
हृदय लग अछि जेबी,
से जखन रहय खाली,
मोन कोना रहत प्रसन्न।
बुद्ध सेहो कहि गेल छलाह ई।
मुम्बइमे सूप मँगलहुँ,
पुछलक अहाँमे जैनी कैकटा छी।
देत लहसुन की नहि रहय तात्पर्य,
आपद्काले रहि गेल अछि आइ काल्हि सदिखन।
सेल टैक्समे करैत छी भरि दिन काज,
तैँ प्रोननशियेशन भेल अछि मराठी,
एक्साइज तँ अछि केन्द्रीय सरकार,
संपर्क बाहरीसँ बेशी।
छत्तीसगढ़क छत्तीस घंटाक यात्रा,
उत्तर-मध्य क्षेत्रक स्तूपकेँ देखल,
बंगाल घूमल पंजाब घूमल,
बंगाली कहलन्हि सुनि जे जौँ,
बंगाली जायत संग करत कानूनी बात\
सरदारजी कहलन्हि रोड पर,
रेड लाइट रहलो क्रॉस करू,
सोझाँसँ अबैत छल एकटा सरदार,
कहल करत आब ई झगड़ा।
सक्सेना कहलक एक मैथिलकेँ,
मैथिल अछि मैथिलक परम शत्रु।
हम कहल सक्सेनाकेँ,हे
जुनि करू हुनका दूरि।
काज सभटा झट कराऊ जुनि भड़काऊ।
बुद्धक भूमिसँ घुरि आयल छथि,
दिल्लीक सड़क पर एहि बेर।
पाटलिपुत्र रहय राजधानी,
हम छलहुँ ततय पुन फेर,
दिल्ली बनल राजधानी भारतक,
कोन जुलुम हम कएल।
कणाद कपिल गौतम जेमिनी देतथि
जौँ नहि काज,
कहलन्हि ई ठीके हृदय लग,
जेबी देने अछि सीबि।
हृदय कोना प्रसन्न रहत जखन,
पेट रहत गय खाली।
जेबीमे पाइ नहि रहत,
उपासे करब हम भाइ।
बुद्ध सेहो कहि गेलाह ई।

नव-घरारी

नव-घरारी

साँप काटल नन्दिनीकेँ,
नव घरारी लेलक खून।
टोलक घरारी छोड़ू जुनि।
ई विशाल जनसंख्या एतय,
छल बनल एकटा काल,
ई नव-घरारी लेलक प्राण,
टोलक घरारी साबिकक डीह,
परञ्च अछि छोट आब की।
खून लेलक आब ई बनि गेल अख्खज,
नव घरारी होयत छोट किछु काल अन्तर।

भ्रातृद्वितीया

. भ्रातृद्वितीया
कय ठाँऊ बैसलि,
आसमे छलि,
भाय आयत,
बीतल,
साँझ आयल।
आँखि नोर छल सुखायल,
चण्डाल कनियाँक गप पर,
सालमे एक बेर छल अबैत,
सेहो क्रम ई टूटल।
कय ठाँऊ बैसलि,
धोखरि अरिपन विसर्जित,
छल साँझ आयल।

चोरुक्का विवाह

चोरुक्का विवाह
सिखायब हिस्सक छूटत,
नहीं आनब कनियाँकेँ,
भायक माथ टूटत।
भेल धमगिज्जर सालक साल बीतत,
युवक-युवती दुनू भेल चोर विवाहक कैदी,
नहीं छल कोनो हाथ परंच,
छल सजा पबैत।
भागल घरसँ युवक आब पछतायल घरबारी,
मुदा की होयत आब,
ओ’ समाजक व्यभिचारी।
एलेक्शनक झगड़ामे भाय-भायकेँ मारल,
चोरुक्का विवाहक घटनामे ओकरा दोहरायल।

थल-थल

थल-थल
कतबो दिन बीतल,
गद्दा जेकाँ थलथल,
पट्टी टोलक ओ’ रस्ता,
भेल आइ निपत्ता।
मटि खसा कय लगा खरंजा,
पजेबाक दय पंक्ति,
नव-बच्चा सभ कोना झूलत,
ओहि गद्दा पर आबि।
थल-थल करैत ओ’ रस्ता,
लोकक शोकक कहाँ भेल बंद,
माँ सीते की अहाँ बिलेलहुँ,
ओहि दरारिमे अंत।

पाँच पाइक लालछड़ी

पाँच पाइक लालछड़ी
परिवार छल चला रहल,
बेचि भरि दिन, पाँच पाइक लालछड़ी,
दस पाइमे कनेक मोट लपेटन।
देखैत नहाइ साँझमे,
ठेला चला कय आयल,
बेटाकेँ पढ़ायल,
आइ.आइ.टी.मे पढ़ि,
निकलल कएलक विवाह,
जजक छलि ओ’ बेटी।
पिता कोन कष्टसँ पढाओल,
गेल बिसरि,
पिताक स्मृतिसँ दूर।
नशा-मदिरामे लीन,
कनियाँ परेशान,
लगेलन्हि आगि, झड़कलि,
ओकरा बचेबामे ओहो गेला झड़कि।
कनियाँतँ गुजिरि गेलीह ठामे,
मुदा ओ’ तीन मास धरि,
कष्ट काटि पश्चात्ताप कए,
मुइलाह बेचारे ।

राजा श्री अनुरन्वज सिंह

राजा श्री अनुरन्वज सिंह
एक सुरमे बाजि देखाऊ,
नहि अरुनन्वन,
नहि सिंह,
पूरा एकहि बेर बताऊ,
राजा श्री अनुरन्वज सिंह।

पिण्डश्याम

पिण्डश्याम
दहेज विरोधी प्रोफेसर,
केर सुनू ई बात,
पुत्री विवाहमे कएल,
एकर ढेर प्रचार।
पुत्रक विवाहमे बदलि सिद्धांत,
वधू रहय श्याम मुदा,
मारुति भेटय श्वेत,
सिद्धांतक मूलमे,
छोड़ू विवेक।

मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम छन्हि हँसमुख भाइ,
बहुत दिनसँ छी आयल करू कोनो उपाय,
मारि तरहक डॉक्युमेंट देलन्हि देखाय,
पुनः-प्रात भ’ जायत देल नीक जेकाँ बुझाय,
शॉर्ट-कट रस्ता सुझाय देलन्हि मुस्काय,
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाय।

बाजा अहाँ बजाऊ

बाजा अहाँ बजाऊ
मेहनति अहाँ करू,
फल हमरा दिय।
चित्र अहाँ बनाऊ,
आवरण सजाऊ,
हमर किताबक।
नृत्य हम करू,
बाजा अहाँ बजाऊ।
कृति हमर रहत,
मेहनति करब अहाँ,
आइसँ नहि ई बात,
अछि जहियासँ शाहजहाँ।

रबड़ खाऊ

रबड़ खाऊ

रबड़ खाऊ आ’ वमन करू चट्टी,
अपचनीय तथ्य सभ देखल भ्रात,
बड़ छल बुधियार,केलक घटकैती,
शुरू जखन भेल सिद्धांत, विवाद,
विवाहठीक भेलाक बादक दोसर सिद्धांत,
लड़का विवाह कालमे बिसरलाह भाषण,
नव सिद्धांतक सृजन कय केलन्हि सम्मार्जन।

अतिचार

अतिचार
तीन साल छल अतिचार,
नहि होयत एहि कारण।
पंडितबे सभ बुझथुन्ह,
छन्हि पत्रा सभ बिकाइत,
पकड़त सभ बनारसी पत्राकेँ,
सेहो नहि बिकायत ,
समय अभावेँ होयत ई,
जौँ अतिशय भ’ जायत।

खगता

खगता
गोर लागि मौसीकेँ निकलैत,
पूछथि अछि किछु खगता,
आइ नहि पूछल जखन,
बैसल फेर ओ’ तखन।
फेर उठल फेर नहि पुछलन्हि,
सोचि जे रहैत नहि छन्हि काज।
जाइ कोना पाइक बड्ड अभाव।
लोक कहैछ,
आयल छथि खगते,
ओना दर्शनहुँ दुर्लभ,
अहीँ कहू,
खगतामे अछि पुछैत क्यो आगूसँ।

शव नहि उठत

शव नहि उठत

गामक कनियाँ मूइलि शव अँगनामे राखल,
सभ युवा कएने अछि नगर दिशि पलायन,
जे क्यो रहथि से घुमैत रहथि ब्लॉक दिशि,
साँझमे अयलाह देखल कहल गेलथि मुइल।
गामपर क्यो नहि उठेलक शवकेँ किएक,
हम कोना छुबितहुँ भाबहु ओ’ होयतीह ।
मुइल पर भाबहु की भैसुर केलहुँ अतत्तह,
समय बदलल नहि बदलल ई गाम हमर।

इटालियन सैलून

इटालियन सैलून
घर भेल समस्तीपुर,
दिल्लीमे छी आयल,
खोलि सैलून इटालियन,
अयलहुँ कमायले’।
पुलिसक रोक देखि कय गेलहुँ गाम घुरि,
पुनः छी आयल, सैलून कतय बानाओल?
ईटा पर जे छी अहाँ बैसल,
सैह कहबैछ, इटालियन,
रोक अहू पर अछि पुलिसक,
सेहो अखनो धरि नहि बूझल यौ अहाँ।

दीया-बाती

दीया-बाती

आयल दीया बाती,
कतेक अमावस्या अछि बीतल,
जकर अन्हारमे लागल चोट,
कतेक जीव थकुचायल पैरहि,
अन्हारक छल थाती।
दीया बाती अनलक प्रकाश,
ज्ञान-ज्योतिक अकाश,
नमन करय छी हम एहि बातक,
अंधकार-तिमिर केर होबय नाश।

एस.एम.एस.

एस.एम.एस.
कहू एहिमे अहाँ छी,
सहमत आ’ की छी अहाँ असहमत,
दुनू रूपमे दिय’ अहाँ,
अपन विचार कय एस. एम.एस.।
आहि कमाऊ अहाँ रुपैय्या,
हम बूरि छी भाइ,
न्यु टेक्नोलोजी छी ई सभ,
बूरि क्यो नहि आइ।

अल्हुआ

अल्हुआ
खाइत भेलहुँ हम अकच्छ तखन,
ई अकाल छल भेल भारि।
वेदपाठक सुनि कय आग्रह,
अएलहुँ हरिद्वार भुखालि।
भरि दिन मंत्र भाखि सोचल,
खीर पूड़ी सभ खायब।
मुदा ओतुक्का पंडित सभ,
खा’ ई सभ छल अघायल।
कएलक मेनू परिवर्त्तन कहलक,
आइ अल्हुआ अहि लायब।
बूझल नहि छल हमरा ई,
हाथ धोने छलहुँ बैसल।
आयल अल्हुआ देखि कर जोड़ि,
विनती कए हम पूछल (अल्हुआसँ),
हमतँ छी ट्रेनसँ आयल,
अहाँ कथीसँ अयलहुँ।
हमरासँ पहिने अहाँ एतय,
कोन सवारी सँ पहुँचलहुँ।

क्लासमे अबाज

क्लासमे अबाज
दुनू दिशक बेंचकेँ उठाकय पुछलन्हि,
आयल कोन कातसँ अबाज।
पकड़ल एक कातकेँ छोड़ल,
फेर कएल दू फारि।
आधक-आध करैत पहुँचलाह,
फेर जखन लग लक्ष्य,
दुइ गोट मध्य जानि नहि सकलाह,
अबाज केलक कोन वत्स।
रैगिंगमे सेहो अहिना कए,
सभकेँ कहल उठि जाऊ,
जखन क्यो नहि उठल कहल,
अहाँ अहाँ अहाँ एकाएकी उठैत जाउ।

बूढ़ वर

बूढ़ वर
कतय छी आयल आइ,
ताकि रहल छी वर,
20-20 वरखक दूटा,
अछि कतहु अभड़ल।
रंग सिलेबी सिंघ मुठिया,
अद्ंत तकैत छी अहाँ,
से भेटत कहिया।
की चाही एकटा पैघ,
20-2- केर दू गोटक बदला,
40 केर जौँ एकटा,
लय ली तँ छी हम तैयारे,
काज खतम करू सभटा।

नौकर

नौकर
फोन करि कय घरमे पूछल,
छथि फलना घरमे आकि,
आगू पुछितथि ओ’ ब्अजलाह,
दय कय एक धुतकारी।
एहि फोनक हम बिल भरैत छी,
नहि करू अहाँ पुनः बात,
मैसेज अहाँक देब हम पुत्रकेँ,
से छी के अहाँ लाट?
नौकर नहि अहाँक ने छी,
से हम अपन पुत्रक,
कनिया कहि टा छी हम नौकर,
बुझू ई यौ अफसर।

फैक्स

फैक्स
फैक्टरी पहुँचि कहल,
करू सर्च वारंट पर साइन,
मालिक कहल रुकू किछु काल धरि,
फोन करय छी आइ।
ट्रांसफरक ऑर्डर आयल,
रिलीविङगक संगहि,
अफसर निकलल ओतयसँ,
वारंट बिना एक्सीक्यूट केनहि।

गैस सिलिण्डरक चोरि

गैस सिलिण्डरक चोरि
गेलहुँ रपट लिखाबय,
भेल छल सिलिण्डरक चोरि।
मोंछ बला थानेदार बजलाह,
बूरि बुझैत छी हमरा सभकेँ,
डबल सिलिनडर चाही,
एफ. आइ. आर. सस्ता नहि,
अछि एतेक हे भाइ।
हम कहल डबल सिलेण्डर,
तँ अछिये हमरा,
अच्छा तँ
तेसर सिलेण्डर लेबाक अछि देरी।
तकल कतय चोरकेँ अहाँ,
अहाँक तकनाइ अछि जेना,
चैत अछि कोल्हूक बरद।
भरि दिन घुमैछ नहि बढ़ैछ,
एको डेग,अहँ नहि करू सैह,
प्रगतिक नाम पर एहि बेर।
स्कूटरक चोरिक बेर कहलक,
इंस्योरेंसक पाइ चाही,
कहू अहाँसँ कोर्टमे भ’ पायत,
देल अहाँसँ गबाही।
फेरी पड़ि जायत अहाँकेँ,
पुनः कोर्टमे जायब,
उलटा निर्णयो भ’ जायत,
बूझि फेर से आयब।
संग गेल ड्राइवर कहलक नोकरी,
छैक एकरे ठीक,
पाइयो अछि कमाइत करि,
रंगदारी,फेकैत पानक पीक।

जोंकही पोखरिमे भरि राति

जोंकही पोखरिमे भरि राति
सुनैत छलहुँ जे बड़बड़ियाबाबू साहेबक,
लगान देलामे जौँ होइत छल लेट।
भरि राति ठाढ़ कएल जोंकही पोखरिमे,
बीतल युग अयलाह फेर जखन हाथी पर,
लेबाक हेतु लगान-लहना जहिना,
गारि-गूरि दैत हाथी पर,
छूटल, टोलक-टोल,
मुँह दुसना,
जमीनदारी खतम भेलो पर सोचल,
किछु ली असूलि,
मुदा लोक सभ बुधियारी कएल,
नहि अएलाह ओ’ घूरि।

रौह नहि नैन

रौह नहि नैन

हँ यौ नैन अछि ई,
मुदा शहरक लोक की बुझय,
सभ ताकैत अछि रौह,
नैन कहबय तँ क्यो नहि कीनय।
छागर खस्सी आ’ बकरीक,
अंतर जौँ जायब फरिछाबय,
बिकायत किछु नहि बिनु टाका,
एहि नगरमे किछु नहि आबय।

जूताक आविष्कार

जूताक आविष्कार
जखन गड़ल एक काँट,
राजा कहलक ओछाउ,
बना माटिक हमर ई,
राजधानी निष्कंटक बनाऊ।

जखन सभटा चर्म आनि कय,
नहि कए सकल ओछाओन,
एक चर्मकार आओल आ’,
राजाकेँ फरिछाय बुझाओल।
पैर बान्हि ली चर्मसँ आकि,
पृथ्वीकेँ झाँपी ओहिसँ,
निष्कंटक धरती नहियोतँ,
मार्ग निष्कंटक होयत।

दरिद्र

दरिद्र
आठ सय बीघा खेत,
कतेक पोखरि चास-बास।
मुदा कालक गति बेचि बिकनि,
झंझारपुरसँ धोती कीनि,
घुरैत काल देखल माँच।
धोती घुरा कय आनल,
आ’ कीनल माँछ,पूछल,
हौ माछ ई काल्हि कतय भेटत,
धोतीतँ जखने पाइ होयत,
जायब कीनि लायब तुरत।
दरिद्रताक कारण हम आब बूझि गेल छी
, एक दिनुका गप नहि ,
सभ दिनुका चरित्र छी।

गंगा ब्रिज

गंगा ब्रिज
यादि अबैत अछि मजूर सभक मृत्यु,
चक्करि खाति खसैत नीचाँ पानिमे,
पचास टा मृत्युमे सँ दस टाक भेल रिपोर्ट,
चालीस गोटेक कमपेनसेसन गेल खाय,
नेता ठीकेदार आ’ अफसर।
एहि खुनीमा ब्रिजक हम इंजीनियर,
कहैत छी हमरा ईमानदार,
घूस कोना लेल होइत छैक ककरो,
देखैत गुनैत ई सभ यौ सरकार।

सादा आकि रंगीन

सादा आकि रंगीन
ब्लैक एण्ड ह्वाइटक गेल जमाना,
सादा कि रंगीन।
दरिभंगा काली मंदिर लगक,
लस्सी बलाक ई मेख-मीन।
जखन बूझि नहि सकलहुँ,
तखन कहल एकगोट मीत,
सादा भेल सादा आ’
भांगक संग भेल रंगीन।

जेठांश

जेठांश
छोट भायकेँ देल परती,
आ’ राखल सेहो जेठांश,
मरल जखन कनियाँ तखन,
भोजक कएल वृत्तांत।
कहल नमहर भोज करू,
पाइ नहि तकर न बहन्ना।
जकरे कहबय से दय देत,
चीनी चाउर सलहाना।
खेत बेचि कय हम कएलहुँ,
श्राद्ध पिताक ओहि बेर।
अपना बेरमे नहि चलत बहन्ना,
फेर बुझू एक बेर।

केवाड़ बन्द

केवाड़ बन्द

बाहरसँ आबयमे भेल लेट,
छोट भाय कएल केवाड़ बन्द,
किछु कालक बाद जखन खुजल,
भैय्या कहल हे अनुज,
दुःखी छी हम पाड़ि ई मोन,
अहिना जखन छलहुँ हम सभ बच्चा,
पिता कएलन्हि घर बन्द।
कनेक देरी होयबाक कारण,
पुछलन्हि नहि ओ’ तुरंत।
तुरंत काका सेहो बुझाओल,
बाल विज्ञानक द्वंद,
जे भेल से बिसरि शुरू,
करू नव जीवन स्वाच्छंद।

नानीक पत्र

नानीक पत्र
पत्र आयल मोन ठीक नहि,
लक्ष्मी अहाँ देखि जाउ,
एहि बेर नहि बाँचब नहि,
ई गप भुझु बाउ।
पेटक अलसर अछि खयने,
चटकार सँ खाओल जेन मसल्ला।
अंतिम क्षण देखबाक बड्ड अछि मोन,
चिट्ठी लिखबाले अयलाह तेहल्ला।
क्यो नहि पहुँचेलकन्हि लक्ष्मीकेँ,
कहल चिट्ठीमे अछि भारभीस कएल,
एक आर चिट्ठी आएल जे,
माय गेलीह देह छोड़ि।
लक्ष्मीक बेटा बोकारि पारि कानय,
कहलक छी हम सभ असहाय।

नहि अयतीह हमर लक्ष्मी,
मायक मुँह देखय अंतिम बेर,
नाम रटैत अहाँक ई बूढ़ि,
गुजरि गेलि जग छोड़ि।
अपन घरक हाल की कहू,
भगवाने छथि सहाय,
घरघुस्सू सभ घरमे अछि,
दैव कृपा हे दाय।

ऑफिसमे भरि राति बन्द

ऑफिसमे भरि राति बन्द

साँझ परल सभ उठल,
गेल अप्पन-अप्पन घर।
बाबूजी रहथि फाइलमे ,
करैत अपनाकेँ व्यस्त।
कौकिदार नहि देलक ध्यान,
केलक बन्द ओहि राति।
हमरा सभ चिंतित भेलहुँ,
कएलहुँ चिंतित कछ्मछ धरि प्राति।
भोरमे जखन दरबान खोलि,
देखलक हुनका ऑफिसमे,
माफी माँगि औँघायल,
पहुँचेलक घर जल्दीसँ।
एक बूढ़ी हमर पड़ोसी,
कहलन्हि कोना रहल भेल,
हमरा सभतँ नहि तकितहुँ बाट,
राति भरिमे भय जयतहुँ अपस्याँत।
बेटा सभ लजकोटर, मुँहचूरू,
छन्हि हिनक हे दाइ (हमर माइ)।

हॉलीक्रॉस स्कूल दरभंगामे,
भेल छल घटित एक बात,

गर्मी तातिलमे बच्चाकेँ,
बन्द कएल दरबान।
महिना भरि खोजबीन भेल,
नहि चलल पता कथूक,
स्कूल खूजल देखल बच्चाक,
लहाश सभ हुजूम।
बाप ओकर मुँहचुरू छल,
स्कूलसँ जौँ बच्चा नहि आयल,
सुतले छोटि गएल तखन,
गेल रहय पछ्तायल।
बच्चा देबाल पर लिखने रहय,
अपन कष्टक बखान,
पानि भोजन बिना,
भेलय ओकर प्राणांत।

तीने टा अछि ऋतु

तीने टा अछि ऋतु
पुछल स्कूल किएक नहि अयलहुँ।

मास्टर साहेब होइत छल बर्खा,
जाइतहुँ हम भीगि।
बर्खामे जायब अहाँ भीगि,
गर्मीमे लागत लू-गर्मी,
आ’ जाड़क शीतलहरीमे,
हाड़-हाड़ होइत जायब यौ,
बौआ होइत अछि ई तीनियेटा ऋतु,
सालमे पढ़ाई-पढय कहिया जायब यौ।

नौकरी

नौकरी

नौकरी नहि करी तखन,
भेटय तनखा तन खायत,
वेतन भेटत बिना तनहि,
आब कते बुझायब।
गाम घूरि जौँ जायब,
खायब की कमलाक बालू,
औ गुलाब काका पहिने,
हमरा ईएह बुझाऊ।
भरि दिनका ठेही अछि जाइत,
जखन जाइत छी सूइत।
भोर उठला संता अखनहुँ,
समस्यासँ अछि नहि छूटि।

नरक निवारण चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी
भुखले भरि दिन दिन बिति गेल,
नरक निवारण लय हम रहलहुँ,
साँझमे मंदिर विदा सभ भेल।
दुर्गापूजा लगमे आयल,
सिंगरहार केर चलती भेल।
माटि काटि गोबरसँ नीपि कय,
भोरे-भोर फूल लोढ़ि लेल।
सरस्वती पूजाक समय बैर,
अशोकक-गाछ-पात गोलीक लेल,
बोने-बोन महुआक फरक लेल,
घूमि-घामि अयलहुँ भेल-भेर।
अण्डीक बीया तेलहानीमे दय कय,
तरुआ ओकर तेलक खएल,
कुण्डली मिरचाइक फरमे अंतर,
बुझैत-बुझैत दिन कत’ गेल।
सुग्गोकेँ ई खोआय रामायण,
सुनला कत्तेक दिन भय गेल।

हर आ’ बरद

हर आ’ बरद

मोन गेल भोथियायल,
जोति बरद सोचिमे पड़लहुँ,
एतय-ओतय केर बात,
हर जोतने भेल साँझ,
हरायल बरद ताकी चारू कात।
कहबय ककरा ई गप्प,
सुनि हँसत हमरा पर आइ,
मोने अछि भोथियायल,
अप्पन सप्पत कहय छी भाय।

आँखि

आँखि
दादा पहुँचलाह डॉक्टर लग,
पुछल होइछ की बाबा,
मर्र डॉक्टर अहाँ छी,
बताऊ भेल की हमरा।
औँठासँ कय शुरू,
बताऊ पहुँचा धरिक समचार,
कहल पहिने करू ठीक,
आँखिकेँ ओ’ सरकार।
कोनो चश्मा नहि फिट पड़ल,
दूरबीनक शीशा जखन लगाओल,
कहल हँ अछि आब कोनहुना,
भाखय अक्षर चराचर।
सड़ही आम देखि बजलाह,
बूढ़ भेलहुँ हम अहाँ बुझय छी बच्चा,
बैलूनसँ खेलायब हम से वयस नहि अछि अच्छा।
यौ दादा ई सड़ही छी,
हम पड़ि गेल छी सोँचहि,
सड़ही आम अहाँ की देखब,
चश्माक नंबरे गलत पड़ल अछि।

टी.टी.

टी.टी.

मजिस्ट्रेट चेकिङ भेल।
वीर सभ भागल बाधे-बाधे,
खेहारलक पुलिस जखन।
चप्पल छोड़ल ओतय बेसुध तन।
मुदा बुरबक लाल एकटा,
चप्पल लेलक उठाय,
दोसर चप्पल छोड़ि पड़ायल,
आयल गाम हँफाइत।
सभ हँसि पुछलक हौ बाबू,
एकटा चट्टी लय कय,
कोन पैरमे पहिरब एकरा,
दोसर खाली होयत।
ई बुरबकहा बुरबके रहल।
हँसि भेड़ सभ भेल।
दोसर दिन बाध सभ गेल ओतय,
देखल सबहक दुनू चट्टी भेल निपत्ता,
बुरबकहाक एक चट्टिये छल बाँचल,
नहि लेलक सोचि करब की एकटा।
मुँह लटकओने सभ घूरल आ’
नाम बदललक बुरबकहाक,
टी.टी. बाबूकेँ ठकलक ई,
नाम होयत सैह एकर आब।

अभ्यास

अभ्यास

पूछल गुरूसँ मृदंगक गति,
भय रहल अछि मंद,
गुरु कहलन्हि से करू तखन,
अभ्यास तखन प्रतिदिन।
प्रतिदिनतँ करितहि छी,
हम एकर सदिखन अभ्यास,
तहुखन हमर घटय अछि,
गति आ’ टूटय लय औ तात।
करू भोर साँझ अहाँ,
अभ्यास बिना करि नागा।
भोर करब अभ्यास जखन,
साँझमे टूटत नहि लय,
साँझमे करब पुनराभ्यास,
होयत भोरमे हाथ गतिमय।
गुरुसँ पूछल कोना जड़,
एहि पाथरसँ हम बनायब,
घोटक गतिमय बनबयमे,
हम माह जखन लगाओल।
कहल गुरू तखन देखू,
एहि जड़-पाथरमे घोटक,
जे बेशी लागय एहिमे,
तोड़ि हटाऊ अहाँ फटाफट।
कहल शिष्य ई काज,
अछि पहिलुक्का काजसँ हल्लुक।
कहल गुरू काज वैह अछि,
सोचबाक अछि ई फेर।
पहिने बेशी काज पड़ल छल,
आब थोड़ अछि भेल।

दूध

दूध
प्रथम जनवरी देखल एक,
भोरे-भोर दूधक लेल,
लागि लाइन जखन आयल बेर,
खुशी-प्रफुल्लित पाओल फेर।
मुदा रस्ताक बीचहि खसल दूध,
ओह भेल अपशकुन बहुत।
सुनि खौँजाइ कहल नहि से,
पता नहि शकुने होअय जे।
कहल हँ-हँ शकुने थीक,
माँ पृथ्वीकेँ लागल अर्घ्य,
प्रथमे पायल प्रथमक भोग,
हरतीह सभटा दुःख आ’ रोग।

गुड-वेरी गुड

गुड-वेरी गुड
भारतीय वाङमय केर,
व्याख्या एहि तरहेँ भेल,
जौँ किछु नीक भेल तँ नीक,
आ’ जौँ उलटा तँ सेहो ठीक।
प्रारब्धक भेल मेल,
आ’ लिखलहाक भेटबाक बात,
नीक भेल तँ गुड आ’
वेरी गुड जौँ भेल अधलाह।

अंध विश्वास

अंध विश्वास

सुमेर पर्वतक चारू-कात,
निशान देखाय कहलक गाइड,
सर्पक चेन्ह ई जे,
भेल समुद्र-मंथन एहिसँ,
सर्प-रस्सा अछि चेन्ह छोड़ि गेल,
चारू-कात तहीसँ।

संगी हमर हँसल कहलक,
कोनो पहाड़ पर जाऊ,
पहाड़ ऊपर चढ़य लेल,
गोलाकार रस्ता बनबाऊ।
नहितँ सोझे ऊपर चढ़ब,
सोझे खसय नीचाँ लय,
हओ गाइड तोहूँ विश्वासक,
छह अंध-काण्ड सुनेबा लय।

रिपेयर

रिपेयर
ऑफिसक तालाक रिपेयर केलक,
बिल मोटगर जखन देलक कारीगर,
हम पूछल एहि ड्रॉवरक तँ,
ताला नहि मह्ग छल,
रिपेयरसँ सस्तमे तँ,
नव ताला आयत गय।
औ’ बाबू तखन कमीशन,
अहीं जाय आऊ द’।

लंदनक खिस्सा

लंदनक खिस्सा
लन्दनक साउथ हॉलमे शहीद भिंडरा,
लेस्टरमे शहीद सतवंत-बेअंत,
नहि मानब हम गुरुकुलकेँ,
होयत खिधांश सुनू तखन।
लेस्टरमे सभ अपने लोक,
नहि भेटैछ अंग्रेज एकोटा।
भेटने हमही मँगैत जाइत छी
, वीसा,पासपोर्ट सेहो सभटा।

कंजूस

कंजूस
तीमन माँगल भनसियासँ,
सूँघा रहल छल गमक।
कहियोतँ अयबह हमरा लग,
देबह तखन उत्तर।
शहर भगेलग पाइ कमेलहुँ,
माँगल पाइ किछु दैह,
बदला पाइक झनक सुनाबह,
गमकसँ नहि अछि मोन भरैत।

दोषी

दोषी

दोषी छह तोँ।
नहि छी मालिक।
देलक दू सटक्का।
हम छी दोषी बाजल,
तखन बता संगीक पता।
साँझ धरि पड़ल मारि,
परञ्च नहि बता सकल ओ’
नाम सङ्गीक। कारण छल नहि ओ’दोषी,
नाम बतायत तखन कथीक।

मजूरी नहि माँगह

मजूरी नहि माँगह
भरि दिन खटि हम गेलहुँ,
माँगय अपन मजूरी।
कहलन्हि जौँ मजूरी मँगबह,
मारि देबह हम छूरी।
कहल नहि बरू दिय मजूरी,
मारू नहि परञ्च ई छूरी।
जियब जखन हम करब काज,
कय आनो ठाम जी-हजूरी।

भारमे माटि

भारमे माटि

काबिल ठाकुर कहल जोनकेँ,
भारमे माटि उघि लाऊ।
दुहु दिशि भार रहततँ,
बोझ दुनू दिशि जायत।
कम थाकब अहाँ आ’,
माटि सेहो बेशी आओत।
दियाद कलामी ठाकुर देखि ई,
सोचल ओ’ नोकसानक भाँज।
भरिया तोरा जान मारतह,
एके बोनिमे दोबर काज!
पटकि भार भरिया पड़ायल,
काबिल ठाकुर रहलाह मसोँसि।
लंघी मारि पैर खींचि कय,
अप्पन कोन भल भेल हे भाइ।

शो-फटक्का

शो-फटक्का
की यौ बाबू शो-फटक्का,
बड्ड देने छी आइ।
पहिने कोनो दिन आबि बुझायब,
नहि जायब पड़ताय।
दहो-दिशा दस दिन काज,
देत चालि संग चालिस साल।
बड़ा देने छी शो-फतक्का,
करू पहिने किछु काज।

अटेंडेंस

अटेंडेंस
लेट किए अएलहुँ अहाँ,
अटेंडेंस लगाऊ।
लाल बहादुर अयलाह जखन,
देखल छल क्रॉस लगायल।
नहि देल ध्यान साइन कएल,
पूछल अफसर लेट छी आयल।
ऊपरसँ कय हस्ताक्षर,
क्रॉस नुकयने नहि अछि मेटायल।
लाल बहादुर कहल सुनू ई,
के करत निर्णय तखन,
हम कएल हस्ताक्षर पहिने,
क्रॉस लगाओल अहाँ तखन।

ट्रांसफर

ट्रांसफर

नॉर्म्सक हिसाबे ट्रांसफर,
कएल हम अहाँक,
कहल छल एकर कोन,
छल महाशय जरूरति।
कएल सेवा हम अहाँक,
राति-दिन भोर धरि।
अप्पन घरक काज छोड़ल,
अहाँक काजकेँ आगू राखल।
ताहिमे नहि हम लगायल,
नॉर्म्स केर नहि गप्प छल आयल।
ट्रांसफरमे ई कतयसँ,
आबि गेल श्रीमान।
तखनहि रोकल हुनक,
ट्रांसफर, औफिसर तत्काल।

फलनाक बेटा

फलनाक बेटा
भोज देलन्हि रेंजरक बाप।
आह कमेने अछि तँ
फलनाक बेटा।
भोज समाप्ति पर लय,
पान सुपारी लय देखल,
रेंजरकेँ जे लोक।
अओ कहू कोन बोनकेँ,
साफ कएल एहि भोजक लेल।

गप्प-सरक्का

गप्प-सरक्का

नहि गेलथि घूमय बूरि,
बुझैत अछि बड्ड छैक काज।
आइ-काल्हितँ अहाँक चलती अछि,
हमरा सभतँ करैत छी बेकाजक काज।

महीस पर वी.आइ.पी.

महीस पर वी.आइ.पी.

छलहुँ हम सभ जाइत,
आर मारि लोकसभ पैरे-पैरे।
दुर्गास्थानमे छल कोनो मेला,
देखि हमरा सभकेँ बाट देल।
मारि लोक छल ओतय छलहुँ,
महीस पर हम चारिटा वी.आइ.पी.ये,
ओकर सभक बात छल लौकिक जौँ,
हमरा लोकनिक आध्यात्मिक तेँ,
मूल-गोत्रक प्रभावे!

गद्दरिक भात

गद्दरिक भात
गत्र- गत्र अछि पाँजर सन,
हड्डी निकलल बाहर भेल।
भात धानक नहि भेटयतँ,
गद्दरियोक किए नहि देल।
औ’ बबू गहूमक नहि पूछू,
दाम बेशी भेल।
गेल ओ’ जमाना बड़का,
बात-गप्प नहि खेलत खेल।

एकटा आर कोपर

एकटा आर कोपर
गप्प पर गप्प,
प्रकाण्डताक विद्वताक।
हम्मर पुरखा ई,
हाथीक चर्चा,
सिक्कड़ि-जंजीर टा जकर बचल।
आँगनमे लालटेन नहि
वरन् डिबिया टिमटिमाइत,
लालटेन गाममे समृद्धिक प्रतीक।
फेर दलान पर गप्पक छोड़,
एकटा कोपर दियौक आउर।

बिकौआ

बिकौआ
बड़ पैघ भोज उपनयनक,
पछबारि पारक छथि नव-धनिक।
बी.के.झा नाम नहि सुनल,
ओतय ठाढ़ ओ’ धनिक।
आरौ बिकौआ छँ तूहीँ,
दूटा पाइ भेल ओ’ भाइ,
कलकत्ता नगरीक प्रतापे।
नहि तँ मरितहुँ बिकौए बनि,
झा,बी.के. नाम भेल।

दूध

दूध

महीस लागल छल लागय,
बहिन दाइक ठाम।
पहुँचलहुँ आस लेने,
ठाँऊ भेल बैसलहुँ ओहि गाम।
दूध छल जाइत औँटल,
मुदा बहिन दाइकेँ गप्पमे
होस नहि रहल।
भोजन समाप्ते प्राय छल,
दूध राखल औँटाइते रहल।
कहल हम हे बहिन दाइ,
अबैत रही रस्तामे देखल,
साँप एक बड़-पैघ,
एतयसँ ओहि लोहिया धरि,
दूध जतय औँटाइछ।
ओह भैया बिसरलहुँ हम,
दूध रहल औँटाइत,
मोनमे बात ततेक छल घुमरल,
होश कहाँ छल आइ।

दि’न

दि’न

विवाह दिन तकेबाक बात,
युवक बाजल पंडितजी अहूँ,
नहि बुझलहुँ अमेरिकाक प्रगति,
ओतय के दि’न तकबैत अछि कहू।
अहाँ अधखिज्जू विद्वान सुनू।
हमर तकलाहा दिनमे विवाह कय,
झगड़ा-झाँटि करितहु बुझु,
जिनगी भरि पड़ै अछि निमाहय।
ओतय बिनु दिनुक विवाह,
भोरसँ साँझेमे भय जाइछ समाप्त।

पुत्रप्राप्ति

पुत्रप्राप्ति
लुधियानाक मन्दिर पर रहैत छी,
पूजा पाठ करैत छी।
कहैत छी अहाँ ठकि कय हम खाइत छी,
गाममे तँ एक साँझ भुखले रहैत जाइत छी।
दस गोटेकेँ पुत्र प्रप्तिक आशीर्वाद देल,
पाँचटाकेँ फलीभूत भेल।
पुत्री जकरा भेलैक से हमरा बिसरि गेल,
मुदा पुत्रबला कएलक हमर प्रचार,
मिथिलाबाबाकेँ ठक कहैत छह,
गामक हमर ओ’ दियादी डाह।

कोठिया पछबाइ टोल

कोठिया पछबाइ टोल

बूढ़ छलाह मरैक मान,
पुत्र पुछल अछि कोनो इच्छा,
जेना मधुर खयबाक मोन,
नीक कपड़ा पहिरबाक मोन,
फल-फूल खयबाक मोन।
कोठाक घर बनयबाक इच्छा,
पूर्ण भय पायत किछु सालक बादे,
कहू कोनो छोट-मोट इच्छा,
पूर करब हम ठामे।

हौ’ कहितो लाजे होइत अछि,
पछिबारि टोल कोठियाक रस्ता,
दुरिगरो रहला उत्तर ओकरे धेलहुँ,
जाइत दुर्गास्थान कारण,
टोल छल ओ’ अडवांस्ड।
मोनमे लेने ई इच्छा जाइत छी,
जे ओहि टोलमे होइत विवाह।
कहैत तावत हालत बिगड़ि गेलन्हि,
ओ’ बूढ़ स्वर्गवासी भेलाह।

कैप्टन

कैप्टन
वॉलीवॉलमे खेलाइत काल,
पप्पू भाइक होइछ हुरदंग,
खेलायब हम फॉरवार्डसँ,
नहि नीक खेलैत छे नीक,
आगू खेलाय देखैब हम।
सभ सोचि विचार कय,
बनाओल कैप्टन पप्पू भायकेँ,
टीमक हारि देखि कय जिद्द,
खेलाय पाछुएसँ।
फारवॉर्ड बनू अहीं सभ
नहि तँ मैच हारू आगुएसँ।

काँकड़ु

काँकड़ु
काँकड़ुगणकेँ छोड़ल एकटा ड्रममे,
नहि बन्न कएलक ऊपरसँ,
पुछल हम छी निःशंक अपने।
यौ मिथिलाक ई अछि काँकड़ु सभ,
एक दोसराक टाँग खींचत,
बक्शा बन्द कर्बाक करू नहि चिन्ता,
खुजलो सभटा सभ ठामे रहत।

जाति

जाति
ऑफिसमे छल काज बाँझल,
किरानी पर एकगोट तमसायल।
कोन जातिक छी अहाँ,
धैर्य आब नहि बाँचल,
दशो लोककेँ कैक दिनसँ छी झुट्ठो घुमाओल।

छाती ठोकिकय जातिक नाम छल ओ’ बाजल,
दसोलोकक दिशि निन्गहारि ताकल,
ताहिमेसँ एक सजाति उठल बाजल,
घोल-आसमर्द्दक बीच कहलक नहि बाजू,
जातिक नाम धय कय,
ई यादि राखू।
काज अछि हमरो बाँझल,
मुदा जातिक अछि बात जौँ,
अछि कलेजावला जाति ई,
से काज कतबो लेट हो।

लोली

लोली
एहि शब्द पर भेल धमगिज्जर,
लोल हम्मर अछि नहि बढ़ल,
एतेक सुन्दर ठोढ़केँ छी,
अहाँ लोली कहि रहल।
हँसल हम नहि स्मृतिकेँ,
छोड़ि छी सकलहुँ अहाँ,
फैशन-लिपिस्टिक युगोमे,
लोलीकेँ खराब बुझलहुँ अहाँ।

गाम

गाम
तीस वर्ष नौकरी कइयो कय,
नहि बनल एकोटा मित्र।
आस-पड़ोसी चिन्हैतो नहि अछि,
ऑफिसक पूछू नहि गति।
गाम छोड़ि शहर छी आयल,
हमर मुदा अछि मोन।
सात जनम घूरि नहि जायब,
गाम छोड़ि नगरक कोनो कोन।

क्रिकेट-फील्डिंग

क्रिकेट-फील्डिंग

हम बाबा करू की पहिने,
बॉलिंग आ’ कि बैटिंग।
बॉलिंग कय हम जायब थाकि,
बैटिंग करि खायब जे मारि।
पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह,
से सुनह हमर ई बात बौआ,
बटिंग बॉलिंग छोड़ि-छाड़ि,
पहिने करह ग’ फील्डिंग हथौआ।

मैट्रिक प्लक

मैट्रिक प्लक

हौ सभकेँ सुनलहुँ केने बी.ए.,एम.ए.,
मुदा बुझल नहि छल डिग्री,
दोसरो होइछ आनो-आनो।
आइ एक पकठोस बटुक,
अछि आयल दलान पर पूछल,
कोन अंग्रेजिया डिग्री छी लेने,
मैट्रिक प्लक एहने किछु बाजल।
हौ काका अछि की ओ’ गेल,
ओकर गेलाक बाद हम बाजब,
कारण अछि भेल ओ’ फेल।

समुद्री


समुद्री
संस्कृतक पाठ नहि पढ़ल,
कोन पाठ अहाँ पढ़ने छी,
पंडित कहि बजबैत अछि सभ क्यो,
त्रिपुण्ड धारण कएने छी!
रहथि हमर पुरखा पंडित,
छोड़ू हमरा इतिहास देखू।
मिथिलाक गौरव याज्ञवलक्य,
कपिल कणादक देश छी ई,
जैमिनीक,गौतमक अछैतहुँ,
पुछै छी पण्डित केहन छी।
सामुद्रिक विद्या ज्योतिषिक जनय छी,
नहि सुनल फेर बहस किए छी केने।
फेर छी हँसी करैत अहाँ यौ,
भविष्यक छी हम हाल लेने।

बानर राजा

बानर राजा
सिँह राजसँ भेल पीड़ित वन-जन,
इलेक्शन करायल मिलि सभ क्यो,
संख्या वानरक हरिण मिला कय,
छल बेशी से भेल ओ’ राजा।
सिंहराजकेँ तामस अयलन्हि,
खा’गेल हरिणराजक बच्चा एकदिन।

दाबीसँ हरिण गेल सम्मुख,
वानर राजा कहलन्हि,
बदमाशी अछि सिंहक,
कहि निकलि गेल जंगल बिच।
गाछक डारि पकड़ि छिप्पी धरि,
खूब मचेलक धूम।
तामसे विख भय सिंह राज,
खएलक बच्चा सभटा मृगराजक,
जखन सुनाओल जाय वनराजकेँ,
फेर वैह धूम फेर मचाओल।
मृगराज कहल हे नृप,
एहि हरकंपसँ होयत,
जीवित हमर संतान।
कहल नृप कहू भाय,
हम्मर मेहनतिमे अछि की कमजोरी,
करल प्रयास हम भरिसक मुदा,
बुझू हमरो मजबूरी।

श्राद्ध नहि मरा जाय

श्राद्ध नहि मरा जाय
एक मृत्यु फेर दोसर मृत्यु,
नेनाक पिताक-काकाक।
कक्काक लोकवेद छलन्हि दबंगर,
से चिन्तित छ्ल छोटका भाइ।
श्राद्धावधिमे दोसर मृत्यु भेने,
एक्के श्राद्धसँ होइछ दोसराक श्राद्ध,
एकक श्राद्ध जायत मराय,
छल चिंतित दूनू भाय।
कमजोरहाक संग पण्डितो देत नहि,
शास्त्र धरि किछुओ कहय,
मामागाम खबरि दियौक,
पिताक श्राद्धने मरा जाय।

मसोमात

मसोमात
मलेमासक मेला-ठेला,
ट्रेनक धक्का मुक्की।
हँसैत-हँसैत पेट छी पकड़ल,
हे यै कनियाकाकी।
कहैइत छलीह एकटा मसोमात,
भीड़मे ओहि गाड़ीमे,
एतेक दुःखतँ ओहू दिन नहि भेल,
भेलहुँ राँड़जाहि दिन,
हौ सवारी।

असत्य

असत्य
हम कक्कर काज नहि कएलहुँ,
बेर पर मुदा काज क्यो आयल?
असत्य नहि कहियो छी बाजल,
सत्यक आस नहि छोड़लहुँ आ’
असत्यक बाट सेहो नहि ताकल।
यौ अहाँ, एहनो क्यो बजैत अछि,
असत्य नहि छी कहियो बाजल,
एहिसँ पैघ कोनो असत्य अछि।
क्यो दुःखी कहलकतँ काज केलहुँ,
अपने जा कय तँ नहि पुछलहुँ,
ओक्कर काज भय जाइत छैक,
तँ उपकरि कय पुछैत छी,
जौँ काजमे भाँगठ होइत छैकतँ,
निपत्ता भय जाइत छी,
बेर पर एहने काज अहाँ अबैत छी।

हम आलांकारिक प्रयोग केलहुँ तेँ,
टाँग पकरैत जाइत छी।

पाइ

पाइ
देखू पाइ नहि लिय’ अहाँ,
बेटा विवाहमे कारण जे,
पुतोहु करत उछन्नड़,
पाइ बाली आयत जौँ।
पूछल अहाँ सभ जे छलियैक लेने,
बेटा विवाहमे पाइ जे,
कहलन्हि अहूमे गप्प अछि दूटा।
पहिल जे पाइ दबबैत अछि लोककेँ।
मुदा दोसर,
जे दबा दैत छियैक,
हमरासभ पाइकेँ ।
जे कहलहुँ गुनू तकरे,
हमरा पर नहि आउ दाइ गे।

बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि

बापकेँ नोशि नहि भेटलन्हि
यौ बुझलहुँ बुच्चुनक गप्प,
नहि करैत छी खिधांश,
सुनू हम्मर साँच।

समयक छल नहि हमरो अभाव,
कहल हँ सुनाउ किछु भाषण-भाख ।

देखि पुछलियैक बुच्चुनकेँ हौ,
ई की उजरा नाँकसँ सुँघने जाइत छह,
कहलक काका खोखीँ होइत छल,
खोखीँक दवाइ अछि ई।
औ बाबू बाप मरि गेलैक,
मोशकिल रहय नौँसि भेटब,
मुदा देखू बेटा सोँटैत अछि विक्स वेपोरब।

गाय

गाय
लाठी मारबामे कोनो देरी नहि,
बछी भेला पर शोको थोड़ नहि,
परन्तु छी पूजनीया अहाँ,
निबंध लिखैत छी अहाँ पर क्षमा।

क-ख सँ दर्शन

क-ख सँ दर्शन
ट्युशन पढ़बय जाइत छँह,
इज्जततँ करैत छौक?
जलखै तँ नहिये परञ्च,
चाहो-पानिक हेतु पुछैत छौह।
ट्युशन कय खाइत छी,
की कहलहुँ हे से नहि बाजू।
द्रोणक नव अवतार छी हम,
से छियन्हि कहि देने,
जाइत देरी करह जलखैक व्यवस्था,
करू नहितँ छी नहि हम द्रोण,
औठाँक नहि कोनो लालसा थोड़।
मात्र पढ़ेबन्हि छओ महिना,
दर्शन नहि होयतन्हि क-ख केर,
नहि से नहि बाजू,
खुआ पिया कय केने अछि ढेर।

होइ अछि जे हुम लुक्खी नहि छी

होइ अछि जे हुम लुक्खी नहि छी
देखि हुनका(गारिपढ़ुआकेँ),
देबय लागलथि गारि,
लुखीक नाम लय कय,
सात पुरखाकेँ देलन्हि ताड़ि।
ओ’ अनठेने ठाढ़ बूझल,
दैत अछि ई लुक्खीकेँ गारि।
कहल अन्तमे(गारि पढ़निहार),
हौ की छह होइत ई,
मूँहतँ छह केहन अप्पन,
लुक्खी नहि अपनाकेँ बुझैत छी।

बेचैन नहि निचैन रहू

बेचैन नहि निचैन रहू
दौरि-दौरि कय पोस्ट-ऑफिस,
भेलहुँ जखन अपस्याँत किएकतँ,
मनीऑर्डरक छल आस।
पुछल एखन धरि अछि नहि आयल,
मनीऑर्डर यौ प्रभास।
चिट्ठीयेक संग पठेने छलथि पाइ,
चिठी तँ समयेसँ पहुँचल,
टाका किए नहि बाउ।
पोस्ट बाबू जे कए नेने रहथि,
हुनकर पाइसँ कोनो उद्यम,
कहल चिट्ठी अबैत अछि,
बेटा अछि अहाँक छट्ठु,
पाइ पठबैत समयसँ तँ पहुँचैत,
मुदा पठबैत अछि छुच्छे संदेश।

बेचैन किए छी,
की अप्पन उद्यम करब हम अहाँक टाकासँ,
से बुझैत छी।

दोसर गामक पोस्टबाबू,
फेकैत अछि चिट्ठी कमलाक धारमे,
हम छी बँटैत तेँ कहैत छी जे भेटल अछि संदेश।

की-की गछलियन्हि

की-की गछलियन्हि
ट्रेनमे भेटलाह घटक,
यौ फलना बाबू।
मुँह देखाबक जोग नहि छोड़ल,
आगाँ की-की बाजू।
शांत बैसू भेल की।
अहाँक अछैत होइत की,
एहि गरीबक पुत्रीक,
कन्यादान संभव की भाइजी।
औ’ अहाँ गछि लेलियन्हि,
भेल कोजगरा द्विरागमनो,
भेटलन्हि किछुओटा नहि वरागतकेँ,
कोनोटा इज्जत नहि राखलन्हि ओ’।
यौ अहूँ हद्द कएलहुँ।
यादि नहि की-की गछलियन्हि।
ओहि सुरमे छलुहुँ बेसुध,
हँ मे हँ टा मिलेलियन्हि।
कहैत गेलाह ओ’ एक पर एक,
नहि कहि कय बुरबकी करितहुँ।
लक्ष्मीपात्र छथि से लक्ष्मी देलियन्हि,
आबोतँ जान बकसू।
मॉटरसायकिल लय की करतथि,
देहो-दशा ताहि लेले चाही,
चेनक लेल बेचैन किय छथि,
निचेन रहथु,
बाकी अछि बात ई।
ताकि रहल छी पुत्रक हेतु,
तकैत रही अँहीक आस,
औ’ छलहुँ कतय भाँसल,
अहाँ यौ घटकराज।
कोनो मोटगर असामी,
आनि करू उद्धार,
तीनू बेटीक कर्जसँ उबारथि जे,
चाही एहन गुणानुरागी।

चोरबजारक जुत्ता

चोरबजारक जुत्ता
ओह नहि मोन पारू,
बुझल अपनाकेँ बुधियार,
आनल ई जुत्ता ततयसँ,
गेलहुँ जहिया चोर बजार।
सैंत कय राखल एकरा,
थाल कीच नहि लागय देल।
पैर दैत छलहुँ पानिमे आ’
जुत्ताकेँ हाथमे लेल। दु
इये दिन तँ पहिरल एकरा,
सीढ़ीसँ छलहुँ उतरैत,
सोलसँ उखड़ि सोझँहि निकलल,
शरीर आत्मासँ रहित जे भेल।
सीबि-साबि कय ची पहिरि रहल,
पाइ वसूली तैयो हएत।
नहि पूछू जौँ पूछय छथि क्यो,
मोन कनैछ भोकारि-पारक लेल।

मरकरी डिलाइट

मरकरी डिलाइट
सोझाँसँ त्रिपुण्ड-चानन, देने आयल रहथि उदना।

देखल गामक प्रवासी जहिना, कहल रौ छँ तोँ भाइ उदना।
संग कटलहुँ बाँस, जड़िमे बान्ही गमछा हम आवाजकेँ दबेबा लेल, आ’ टेंगारीसँ दू छहमे काटय छलह तोँ, पुरनाहाक डबरामे लीढ़क नीचा नुका कय, करी संपन्न ई काज बिन विघ्न।

हम पश्चात् भेलहुँ प्रवासी, मरकरी-डिलाइट दयकेँ तोँ, भेलह गामक वासी।
पंडितक अकाल छल नहि, छलह कोनो कंपीटीशन, भेलहुँ अहाँ औ’ भजार, गामक नव उदयनाचार्य।

फ्रैक्चर

फ्रैक्चर

हॉस्पीटलमे आबाजाही
गामक प्रवासीक।
बुझैत छलाह जखन समाचार पिताक भर्त्तीक।
ठामहि दरभङ्गा बस-स्टैंडहिसँ,
गाम जयबाक बदला अबैथ हॉस्पीटल।

की केलहुँ शरीरकेँ,
आ’ नहिये बनेलहुँ जमीन-जत्था।
बच्चा सभक लेल नहि
राखल दृष्टि यैह व्यथा।
की सभ करैत,
कतय नहि पढ़ैत,
चण्डाल किए भेलहुँ हे कक्का।

ओतहि बैसल छलाह टुटियाँ,
पिताक समक्ष,
पहिनहिँ बुझने छलाह जे,
छल ई फ्रैक्चर।
कहल पहिने समाचार तँ पुछिअन्हु,
चाहो आब अबैत होयत,
पैर हाथ धोआय अनिहन्हु।
कहल पैर टुटि गेल की कका,
पिता किछु बजितथि,
बजलाह टुटियाँ,
होइछ टूटब आ’ फ्रैक्चर होयब एक्के,
नहि छलन्हि बूझल से,
कहल नहि चिंता करैत जाउ,
भगवान रक्ष रखलन्हि,
फ्रैक्चरे भेलन्हि,
पैर टूटल नहि बाउ।

स्मृति-भय

स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहल्मे
, बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आ’ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आ’कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आ’कि हारि मानब,
समस्यासँ,आ’ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर,भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर-खाँटी पारिवारिक।

मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,
बच्चा नहि,भ’ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल,स्मृति बिसरल,भेलहुँ एकाकी।
सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल,फूलि गेल साँस,

हड़बड़ाक’ उठलहुँ हम,
आबि गेल हँसी,
स्वप्नानुशासन,
लट्पटाकेँ खसलहुँ नहि,
धपाक; भ’ गेलहुँ अछि पैघ।

बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आ’ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल,
गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत,करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आ’ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आ’ जौं अछि क्यो,त’ ओकर
निर्माता अछि के’,
ओह! नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन,तोड़ल कलम,
करची आ’ दवात।
के छी ई सहस्त्रबाढ़नि
, घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,

शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आ’ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आ’
तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आ’
सभक स्वामी के?
आ’ तकरो के अछि स्वामी!

भेटल स्वप्नानुशासन,
टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान ल’ग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।

जेना कोनो भय,कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छतीक धरधरी,
आ’ कि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,आत्माक डोरी?
आ’ कि किण्वन आ’ विज्ञान
केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आ’ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत,कषाय,क्षार,
अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार,
मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि अत्रि,
अंगिरा, मरीचि, संग लेने
पुलऋतु,पुलस्त्य आ’ वशिष्ठ।
प्राप्त करबालेल अष्टसिद्धि अण्मिक,
महिमाक, गरिमाक, लघिमाक,
प्राप्तिक, प्राकाम्यक, ईशित्व
आकि वशित्व, सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज-पद्म,महापद्म,
शंख,मकर, कच्छप, मुकुन्द,कुन्द,
नील आ’ खर्व,
बनल आधार दशावतारक।
मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद,
सप्तर्षिकेँ, आ’ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आ’
वासुक व्याल, आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश,
मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद,
मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल,
दू पगमे पृथ्वी आ’ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आ’ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आ’ बुद्धि बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा,
खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः।क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय,
जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आ’ तेरह विश्वक,
अनबा युग-कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल,
नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन,
ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि,
उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह,
फेर नरसिंह,
तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओ’ ताहि द्वारेतँ नहीं एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ’,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,
गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय,
बिहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित,
आ’ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर,
जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,
यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर,
दर्शनकेँ धर्ममे आ’ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आ’ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी

विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर।
तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू,
मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे,भानुमतीयोमे
कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख
मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आ’ कला,भूख आ’ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,ब्राह्मण आ’
शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू
परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास।
यादि पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,
भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आ’ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आ’
ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यास्जीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ
सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत,
नहीं भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,
सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिनपानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज,
कि होयत बंद? आ’कि
एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक
एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह
पक्का बारहमे, आ’ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आ’ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आ’
एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ केला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।

दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरनT खेलेलहुँ
देश आ’ प्त्नीक संग।
तैं दैत छी ह’म ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि
आबय ठोकर मारि पड़ाय,
सतघरिया; ती-ती –तीतार तार
मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ
आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ
द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी
तक कनियाक संग।
वासर-रैन
हे युधिष्ठिर-रूपी
भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा,
दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,
दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हमारा गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन,
करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक,
रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।

भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,
गंगा-तनु झामर,नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केल’क छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम,पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन-अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हमारा जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,
दुइ सहस्त्राब्दिक खेल केलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हमारा तात,
परञ्च जे ज्ञात,
तकर त’ करए दिय’ हिसाब-किताब।

महाबलीपुरममे

महाबलीपुरममे
असीम समुद्रक कातक दृश्य,
हृदय भेल उमंगसँ पूरित।
सूर्य-मंदिर पांडव-रथ संग,
आकश-द्वीपक दर्शन कयल हम।
नूनगर पानि जखन मुँह गेल,
भेलहुँ आश्चर्यित,गेलहुँ हमारा हेल।
लहरिक दीवारिसँ हमारा टकराय,
अंग-अंग सिहरि-सिहराय।
देखल सुनल समुद्रक बात,
बिसरल मन-तन लेलहुँ निसास।
सुनेलक ‘मणि’ गाइड ई बात,
एलथि विदेशी खोललथि ई सत्य,
पल्लव वंशक ई छल देन,
भारतवसी बिसरल तनि भेर।
मोन पडल अंकोरवाटक मंदिर,
राजा खतम भेल बिसरल जन,
हरि-हरि। टूटल इतिहासक तार जखन,
स्वाति भेल ह्रास अखन;
कास्पियन सागरक पानिक भीतरक मंदिर,
भारतीय व्यापारीक द्वारा निर्मित।
आब एखन अछि हम्मर ई हाल,
गामक बोरिंग पम्पसेट अमेरिकन इंजीनियरक खैरात।
छोडू भसियेलहुँ कतय अहाँ फेर,
प्रीति,पत्नी,हँसि-हँसि भेलथि भेड़।

सन सत्तासीक बाढ़ि

सन सत्तासीक बाढ़ि

कमलामहारानीकेँ पार कएल पैरे,
बलानकेँ मुदा नाउक सहारे।
मुदा आइ ई की भेल बात,
दुनू छ’हरक बीच ई पानि,
झझा देत किछु कालमे लियऽ मानि।

चरित्रक ई परिवर्तन देलक डराय,

नव विज्ञानक बात सुनाय।
बाँध-बाँधि सकत प्रकृति की?
भीषण भेल आर अछि ई।
हृदयमे देलक भयक अवतार,
देखल छल हम गामक बात।
बड़का क’लम आ’ फुलवारीमे,
बड़का बाहा देल छल गेल;
पानिक निकासी होइत छल खेल।
नव विज्ञानी ई की केलथि,
बाहा सभटा बन्न भऽ गेल।
फाटक लागल छहरक भीतर,
बालु मूँहकेँ बन्न कय देल।
एक पेड़िया पर छलहुँ चलल हम,
आरिये-आरिये, देखल रुक्ष।
पहिने छल अरिया दुर्भिक्ष,
आब दुर्भिक्ष अछि छुच्छ।
सिल्ली, नीलगाय सभटा सुन्न,
उपनयनमे शाही काँट अनुपलब्ध।
जूड़िशीतलक भोगक छल राखल,
गाछक नीचाँ सप्ताह बीतल।
नहि क्यो वन्यप्राणी आयल खाय,
चुट्टीक पाँत पसरायल जाय।

छहरपर ठाढ़ अभियन्ताक गप,
छलहुँ सुनैत हम निर्लिप्त।
मुदा जाहि धारकेँ कएल पैर पार,
तकर रूप अछि ई विस्तार।
नवविज्ञानिक चरित्रानुवाद होयत एहन नहि छल हम जानल,
मुदा देने छल ओकरा दुत्कार,
कुसियारक किछु गाछ,पानिक बीचमे ठाढ़।
माटिक रंगक पानि,आ’ हरियर कचोड़ गाछ,
छहरक ऊपरसँ झझायल पानि,
लागल काटय छहरकेँ धारक-धार।
ठाम-ठाम क़टल छल छहर,
ऊपरसँ बुन्नी परि रहल।
सभटा धान-चारु,भीतक कोठी,
टूटि खसल,पानिक भेल ग्रास।
हेलिकॉप्टरसँ खसल चूड़ा-गूड़,
जतय नहि आयल छल बाढ़ि,
किएकतँ पानिमे खसाकय होयत बर्बाद।
हेलीकॉप्टरक नीचाँ दौड़ैत छल भीड़,
भूखल पेट, युवा आ’ वृद्ध।
ओ’ बूढ़ खा’ रहल छथि चूड़ा-गूड़,
बेटा-पुतोहुक शोक की करि सकत पेटक क्षुधा दूर?

एकटा बी.डी.ओ.क बेटा छल मित्र,
कहलक ई सरकार अछि क्षुद्र,
ओकरा पिताकेँ शंटिंग केलक पोस्टिंग,
गिरीडीह सँ झंझारपुरक डिमोशन, कनिंग।
मुदा भाग्यक प्रारब्ध अछि जोड़,
आयल बाढ़ि पोस्टिंग भेल फिट।
सोचलहुँ जे हमरेटा प्रारब्ध अछि नीच,
शनियो नीच, सरस्वती मँगेतथि की भीख?
पहुँचलहुँ गाम, पप्पू भाइक मोन छोट,
विकासक रूपरेखा, जल-छाजन,निकासी..,...
बात पर बात फेर सरकारक घोषणा,
बाढ़ि राहत, एक-एक बोरा अनाज,
सभ बोरामे पंद्रह किलो निकाललथि ब्लॉकक कर्मचारी।
बूरि छी पप्पू भाई अहूँ,
मँगनीक बरदक गनैत छी दाँत,
पिछला बेर ईहो नहीं प्राप्त।
हप्ता दस दिनक बादक बात,
क्यो गेल बंबई,क्यो धेलक दिल्लीक बाट;
गाममे स्त्री,वृद्ध आ’ बच्चा,
बंबईमे तँ तरकारी बेचब,बोझो उठायब;
सभ क्यो केलक ई प्रण,
मायक स्वप्न अछि कोठाक होय घर,
अगिलहीक बाद फूस आ’ खपड़ा,
पुनः बनायल बखाड़ी जखन भेल बखड़ा।
भने भसल बाढ़िमे भीत,
बनायब कोठाक घर हे मीत।
खसल लागल ईंटा गाममे,
कोठा-कोठामे भेल ठाम-ठाममे।
पुरनका कोनटा सभ गेल हेराय,
जतय हेरयबाक नुक्का-छिप्पी खेलायल ह’म भाय।
आब सुनु सरकारक खटरास,
आर्थिक स्थिति सुधारल
ह’म मेहथमे क’ खास।
आदर्श ग्राम प्रखंडक एकरा बनाओल,
कहैत छी जे ह’म बंबई दिल्लीमे कमाओल,
सुनु तखन ई बात,
जौं रहैत अस्थिर सरकार,
तँ रहैत नहीं दिल्ली नहि बम्मई,
विजयनहरम साम्राज्यक हाल,
पुरातात्विककेँ अछि बूझल ई बात।
धन्यभाग ई मनाऊ,
हमरा जितबिते रहू हे दाऊ।
प्रगति-परिश्रम अहाँ करू,
हमर समस्यासँ दूर रहू।
बाढ़ि आयल सत्तासीमे,
तबाही देखलहूँ,
मुदा कहैत छी हम,
देखू आबाजाहीकेँ।

धन्यभाग हे नेता भाई,
अहीसँ तँ मनोरंजन होइत अछि,
मेला-ठेला खतम भय गेल,
हुक्कालोली भेल दिवाली,
आ’ जूड़िशीतलक थाल-कादो-गर्दा
भेल होली।
तखन अहूँक बात सुनने दोष नहि ,
कमायलेल हमहूतँ दिल्ली-बंबई आयल छी,
कमसँ कम अहाँक ई बड़कपन,
जे गामकेँ नहि छोड़ल,
मनोरंजनो करैत छी,
कमाइतो छी,खाइतो छी।
आ’ दिल्ली बंबइ सेहो घुमैत छी।

सूर्य-नमस्कार

सूर्य-नमस्कार

ॐ मित्राय नमः।।1॥
आँखि करताह ठीक मह,
हिनकर लाली’ कत्था-पान,
दाँतक त’रमे जखन चबान,
हनूमानक सूर्यक ग्रहण पड़ल मोन,
लाली देखल चढ़िकय मचान।
सूर्य-ग्रहणक वर्ण अछि,
नहि ई राहुक ग्रास,
विज्ञानक छैक सभ बात,
कहलन्हि कुलदीप काक।
पृथ्वी घुमैछ पश्चिम सँ पूर्व,आऽ,
सूर्य केँ घूमबैत अछि पूर्व सँ पश्चिम।
मुदा कहू जे गर्मीमे उत्तर-पूर्व आऽ
जाड़मे उत्तर-पश्चिम कियै छथि सूर्य।

की नहीं चलैत छथि अपन अक्ष,
ग्रहणक हेतु राहुक नहि काज,
चन्द्रमा बीचमे किरणक करै छथि ग्रास।
सभ गणना कय ठामे देल,
बूड़ि पंडित केलक अपवित्रक खेल।
खेल-खेलमे देश गेल पाछू,
आबहुतँ सभ आगू ताकू।
पुनि-पुनि करि दण्ड हम देल,
स्थिरचित्त नेत्र ई सभक लेल;
राहू-केतु सभक दिन आब गेल।
गंगामे गोदावरी तीरथमे प्रयाग,
धन्यभाग कौशल्यामायकेँ राम लेल अवतार।
स्नानक बादक मंत्रक ई भाग,
खोलत भरत प्रगति-एकताक द्वार।
शक्ति देहु हे भानु मामहः; ॐ रवये नमः।।2॥

मेरुदण्ड-पग होयत सबल,
सूर्य-नमस्कारक परञ्च पाठ प्रबल।
सूर्यवंशीयोक अहह अभाग,
कर्ण-तर्पणक नहि करू बात।
जाति-कर्मक ज्ञानक ओर,
छल ओतय, नहि किएक पकड़ल।
राहू-ग्रासक बातक मर्म, अहह;
ॐ सूर्याय नमः॥3॥
सात अश्व-रथक उमंग,
रथमूसल अजातशत्रूक संग,
महाशिलाकंटकक जोड़,
केलक मगध काज नहि थोड़।
जर्मनी-इटलीक एकताक प्रयास,
दुइ सहस्त्राब्दी पहिनहि काश,
रश्मिक सात-अश्वक रहस्य,
बूझल मगध ताहिये पहर।
छोड़ल भाव पकड़लहूँ अर्थ,
हा’ भरतपुत्र केलहुँ अनर्थ।
भरु शक्ति हे सूर्य अहाँ;
ॐ भानवे नमः।

श्वासक-कुंभक केलहूँ अभ्यास,
यादि पड़ल कुन्तीक अनायास।
सूर्यमेल सुफल भऽ गेल,
कवच-कुण्डल भेटल,
सेहो इन्द्रहि संगे गेल।
एकलव्य पहिनहि द्रोण केलन्हि फेल,
अर्जुन, कर्ण-विजय कय लेल?
अखनहुँ ई प्रतियोगितामे अछि भेल,
प्रतिभाक रूप छय विकृत कैल,
अखनहूँ धरि की तू ई सहबह !!
ॐ खगाय नमः॥5॥
सूर्या आश्विन गमनमे फेर,
अछि परस्पर द्वंदक देरि,
गुरु बृहस्पति ठाढ़े-ठाढ़ ,
करतथि ई सभक उद्धार।
अखनहुँ गुरु छथि गूड़,
शूल दैत जोड़ पर हमारा ऋणी,
कहैत जे बनओताह हमरा चिन्नी,
रहताह स्वयं कुसियारक गूड़,
गुरुक-गुरुत्व उष्ण-सुड्डाह हह,
ॐ पूष्णे नमः॥6॥
जकर अंकसँ निकलल विश्व
विश्वक प्राण, आऽ तकर श्वासोच्छवास,
गुरुत्वक खेलकेँ बनेलहूँ अहाँ, काछुक,
सहस्त्रनागक फनि जानि कि-की?
एकटा रहस्य आर गहिरायल,
भरत-पुत्र गेल हेरायल।
तकर ध्यान हेयास्तदवृत्तयः;
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः॥7।।
सूर्यकिरण पसरि छय गेल,
कतेक रहस्य बिला अछि गेल,
तिमिरक धुँध भेल अछि कातर,
मुदा ई की अद्भुत भेल।
रात्रि-प्रहर देखलहुँ सप्त-ऋषिगण,
दिनमे सभ-किछु स्वच्छ अछि भेल,
मुदा नहीं तरेगणक लेल ई भेल।
सत्यक परत तहियायल बनल खेल,
हाऽ विश्ववासी शब्दक ई मेल,
अहाँक दर्शनक स्तंभ किए भेल।
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः।
ॐ मरीच्ये नमः॥8।।
अहँक तेजमे हे पतंग प्रभाकर,
सागराम्बरा अछि जे नहायल,
सौर ऊर्जाक नव-सिद्धांत,
नहीं की देलक कनियोटा आस,
मेघा-मास नहि अहाँक अछि जोड़,
तखन मनुक्खक बात की छोड़।
पढ़ल ग्रंथ ब्रह्मांडक बात,
तरणि सहस्त्र एकरा पार,
अंशुमाली तपनसँ पैघगर गाल।
तकर ऊष्णता की हम सहब;

ॐ आदित्याय नमः॥9॥

पिताक बात अछि आयल मोन,
बिना सावित्रीक गायत्रीक की मोल,
दुइ वस्तुक मेल कखनहुँ नीक,
कहुखन परिणाम भेल विपरीत।
कटहर-कोआ खेलाह तात,
देलन्हि ऊपर पानक पात।
पेट फूलल भेल भिसिण्ड,
परल मोन रसायन-शास्त्र।
तीव्रसंवेगानामासन्नः;
ॐ सवित्रे नमः॥10॥

मोन पड़ल चोरी केर बात,
चोरक आँखिमे आकक पात,
पातक दूध पड़ला संता चोर,

सोचलक आब आँखि गेल छोड़ि।
कहलक मोने बुद-बुद्काय,
करु तेल नहि देब मोर भाय।
अर्कक दूधक संग करु तेल,
बना देत सूरदासक चेल।
गौवाँ केलन्हि बुरबकी एहि बेर,
चोरक बुनल जालक फेर।
तेल ढ़ारि पठौलन्हि चोरकेँ गाम।

मुदा रसायन भेल विपरीत,
चोरक आँखि बचि गेल हे मीत।
गौआँक काजक हम लेब नहि पक्ष,
बस सुनायल रटन्त विद्याक विपक्ष।
ध्यान धरह आ’ ई कहह;
ॐ अर्काय नमः॥11॥
पोथीक भाष्य आ’ भाष्यक भाष्य,
अलंकारक जाल-जंजाल,
विज्ञानक पाखंड,
ऋतम्भरा बुद्धि कतय छल गेल।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः;
ॐ भास्कराय नमः॥12।।
करु स्वीकार हमर ई कविता,
हे दुःखमोचन हे, हे सविता।
दूर करू विकार संपूर्ण;
केलहुँ सूर्य-नमस्कार हम पूर्ण।

ट्रेन छल लेट

ट्रेन छल लेट

जायब दिल्ली कोना,
अस्पतालक भर्ती कक्ष,
ट्रेन अछि लेट, डॉक्टर अछि व्यस्त।
पहुँचलहुँ दिल्ली,
दिल्ली दूर अस्त,
दिल्लीक सरकारी डॉक्टर,
आइ,काल्हि,परसू,भेलहुँ पस्त।
युग बदलल,गणतंत्र आयल,
मुदा ट्रेन दिल्ली जायबला,
आ’ डॉक्टर दूनू फुर्र,
दिल्ली अखनहुँ अछि दूर।

वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ


वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,
आइ देखल हम मीत,
डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,
दंभ भरइ छथि,हा’ इष्ट।
साबुन-तेल सभपर टैक्स,
भरइ छथि सभ वासी,
लैटरीन गंदा अछि पुछने,
नर्स बिगरि देखबइ छथि अपोलोक पगपाती।
जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,
टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ जाऊ बूझाबय।

इच्छा-मृत्यु

इच्छा-मृत्यु


हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,
सुनल छल खाइत पान-मखान,
मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,
ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
भीषणताक’ कथा नहि थोड़,
भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,
हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,

केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,
घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,
केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।
एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,
छोड़ल अ’हाँ निसास।
हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,
पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,
बुझल भीष्म हम आब ई बात,
पेलहुँ इच्छा-मृत्युएँ अहाँ निजात।

(c) २०००-२०२२ भालसरिक गाछ/ विदेह इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/, http://www.geocities.com/ggajendra , http://www.geocities.com/gajendrathakur/  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि तऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

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