भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra   आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha   258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/   पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

 

(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

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स्थायी स्तम्भ जेना मिथिला-रत्न, मिथिलाक खोज, विदेह पेटार आ सूचना-संपर्क-अन्वेषण सभ अंकमे समान अछि, ताहि हेतु ई सभ स्तम्भ सभ अंकमे नइ देल जाइत अछि, ई सभ स्तम्भ देखबा लेल क्लिक करू नीचाँ देल विदेहक 346म आ 347 म अंक, ऐ दुनू अंकमे सम्मिलित रूपेँ ई सभ स्तम्भ देल गेल अछि।

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Monday, July 05, 2004

"भालसरिक गाछ" - ' मैथिली भाषा केर प्रथम ब्लॉग '

भालसरिक गाछ आब विदेह ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर

भालसरिक गाछक चरचा

ई ब्लॉग किएक तँ विशिष्ट अछि, ताहि द्वारे संदेशकेँ सम्पादित कए, 5 जुलाई 2004सँ आइ धरि, एकर विस्तार कएल गेल अछि, नव-पोस्ट देलाक बदलामे एडिटिंग कए नीचामे एकरा बढ़ाओल जाइत छल । सन 2008 सँ एकर विस्तार बेशी नमगर भए जएबाक कारण रोकि देल गेल, किछु हीस काटलो गेल आ' नव-नव पोस्टिंग शुरू कएल गेल। 2006 मे सेहो पोस्टिँग कएल गेल मुदा फेर 2008 तक ओ' स्थगित रहल। ब्लॉगर केर यू.आर.एल. मे 2004/07/bhalsarik-gachh.html (भालसरिक-गाछ) सम्मिलित अछि, जे एकर मैथिली भाषामे होएबाक अकाट्य प्रमाण अछि।

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भालसरिक गाछक छाहमे
उपन्यास
सहस्रबाढ़नि
सन~~ 1885 ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एक बालकक जन्म भेल। एहि वर्षमे कांग्रेस पार्टीक स्थापना बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमयवला छल। अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कए चुकल छल।राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह।शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रअहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भय गेल। मिलाजुलाकेँ कांग्रेसी लोकनि अंग्रेजीराज आ’ भारतीय रजवाड़ा सभक सम्मिलित शासनकेँ स्थायित्व आ’ यथास्थिति निर्माणकर्त्ताक रूपमे स्थान भेटि चुकल छल। कांग्रेस अपन यथास्थितिवादी स्वरूपकेँ बदलबाक हेतु भविष्यमे एकटा आन्दोलनात्मक स्वरूप ग्रहण करयबला छल। संस्क़ृतक रटन्त विद्याक वर्चस्व छल। परंतु सरकारी पद बिना आङ्ल सिखलासँ भेटब असंभव छल। सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आ’ ओतबहि धरि सीमित छल। मुदा किछु समयापरान्त अंग्रेजक किरानीबाबू लोकनि सेहो अस्तित्वमे अयलाह।

तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल। मैथिल परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ’ ताहि कारणसँ अधिकांश परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल छल। मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक कलिकतियाबाबूकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएल। तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह। बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भ’ गेलाह। जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू अन्यमनस्क पड़ल आ’ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह, तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत से आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त क’ रहल छथि। हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल, नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ’ ओ’ बेंग जेंकाँ पाछू सँ सोझे आगू फाँगि जाइत छलाह। पूरा बेंग जेकाँ-अनायासहि ओ’ मुस्कुरा उठलाह। पत्नी पूछि देलखिन्ह जे कोन बात पर मुस्कुरेलहुँ, तँ पहिने तँ ना-नुकुर केलन्हि फेर सभटा गप कहि देलखिन्ह। तखनतँ गप पर गप निकलय लागल।
“एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा’ रहल छथि। आँगनसँ बाहर भेला पर जतय अंकर-पाथर देखल ततय ठेहुन उठा कय, मात्र हाथ आ’ पैर पर आगू बढ़य लगलाह” , पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि।
“एक दिन हम देखलहुँ जे ओ’ देबालकेँ पकड़ि कय खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि। हमरो की फूड़ल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह। दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह। हाथ पहुँचबे नहि करन्हि। फेर तेसर बेर जेना कूदि गेलाह आ’ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ’ ठाढ़ भ’ गेलाह” , झिंगुर बाबूकेँ एकाएक यादि पड़लन्हि।
“एक दिन हम ओहिना एक-दू बाजि रहल छलहुँ। हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ। फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ। तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”।
“ एक दिन खेत परसँ एलहुँ आ’ नहा-सोना भोजन कय खखसि रहल छलहुँ। अहाहा’ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहा’ केलथि। घूरि कय देखलहुँ तँ ओ’ गेंदसँ बैसि कय खेला रहल छलाह। दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह। हम कहलहुँ किछु नहि, ई हमर नकल कय रहल छथि। दलान पर सभ क्यो हँसय लागल। फेर तँ जे आबय, कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ दोसरे तरीकासँ कहथि। उम्र कतेक हेतन्हि, नौ-वा दस महिना”।
“ हम जे सुनेलहुँ ताहि समय कतेक वयस होयतन्हि, छ’ आ’ कि सात मास”। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे-‘गप सुनलहुँ’ वा’ ई करू वा’ ओ’ करू बजैत छलीह। मुदा सासु- ससुरक सोझाँ तृतीया पुरुषमे-सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक-। आ’ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक काजक लेल काजक अनुकरणमे तृतीया पुरुषमे जवाब देथि। मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक। पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझताह जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक छथि। पनी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल। मुदा एहि बेर झिंगुर कन्नी काटि गेलाह। मुस्की दैत दलान दिशि निकलि गेलाह, ओतय किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात क’ रहल छलाह। भोरहाकातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल। भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान सभ पहुँचि जाइत छल। एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कय कोड़ि आ’ चूरि कय बनायल। बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतय पहुँचैत छल। झिंगुर बाबू कचोट केलन्हि तँ आन लोक सभ कहलखिन्ह जे से की कहैत छी। अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति हेतु अपनासँ दूर रखने छी, तँ एहिमे कचोट कथीक। एकौरसँ ठाकुर परिवार मात्र एक घर मेंहथ आयल आ’ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भ’ गेल अछि। डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेट गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ ल’ कय आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे। अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता द’ देल गेल छैक। तखने एकौरसँ एकटा समदी एलाह आ’ भोजपत्रमे तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह। झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ’ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ’ पत्र पढ़य लगलाह। प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि। ‘परतापुरक सभागाछी देखि कय जायब’ , ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह, एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि। फेर आँगन जाय पत्र पढ़ब प्रारंभ कएल।
॥श्रीः॥
स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु। शतम~ कुशलम। आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ’ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी। अहाँक प्रपितामह आ’ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लथि। अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह। हर्षक वा’ शोकक कोनो घटना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ’ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अयने अशोचक विचार नहि करबासँ भविष्यक अनिष्टक डर अछि। संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी। अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी। परतापुरक सभागछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लालायित सेहो छथि। अगला महीनाक प्रथम सोमकेँ जौँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत। बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भ’ जायत। इति शुभम~।
बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ’ तकर नीचाँ सभागछी। बलानक धार खूब गहींर आ’ पूर्ण शांत। ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ’ पिपराघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भ’ एकर धारकेँ रोकि देलक आ’ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल। बलान झंझारपुर दिशि आ’ कमला मेंहथ , गढ़िया आ’ नरुआर दिशि। बलान गहींर आ’ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी। बाढ़िक संग रेत कमला आनय लगलीह। ग्रीष्म ऋतुमे बलान पूर्वे रूप जेकाँ रहैत छथि, बिना नावक पार केनाइ कठिन, किंतु कमलामहारानीकेँ पैरे लोक पार करैत रहथि। सभटा सभागछीक चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल। चारूदिश रेत आ’ सभागाछी उपटि गेल। चलि गेल सभटा वैभव सौराठ। मुदा झिंगुर बाबूक कालमे परतेपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल, से बादहुमे परम्परारूपमे रहल।
कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जयताह,,,, , तखन हुनका ल’ कय एकौर जायब। बेचारे बहुत दिन तपस्या कयलन्हि। एहि बेर मामा गाम, दीदीगाम सभ ठाम घुमा देबन्हि। सभकेँ मोन लागल छैक।

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भालसरिक धोधरि
महाभारत
1

पाराशर पुत्र भगवान व्यासकेँ,
नमन-नमन शत नमन।
केलन्हि चारू वेद लिपिबद्ध
, आ’ जय संहिता सम्मिलन॥
ध’ कय ध्यान ब्रह्माकेँ पूछल,
पूछल के करत आब निबद्ध।
ई नव ग्रंथ जे आयल अछि,
अछि आयल मानस पटल समक्ष॥
ब्रह्मा अति प्रसन्न भय कहल,
करू प्रसन्न अहँ प्रसन्नवदनकेँ।
वैह लिखि सकैत छथि पल,
पल नित पल एहि ग्रंथ सकलकेँ॥
केलन्हि ऋषि ध्यान गणेशक,
आग्रह कएल प्रसन्नवदनकेँ।
लिपिबद्ध करू भारतकेँ देववर,
जाहिने छूटल किछु एहि जगकेँ॥
कहल विनायक करब हम लिपिबद्ध ई,
करू मुदा ई काज।
रुकय नहि अहाँक वाणी हमर शर्त्त ई,
नहि तँ रुकत ई काज॥
व्यास से स्वीकारि कहल,
मुदा राखू हमरो ई बात।
लिखू अनवरत हे विनायक,
मुदा बूझि सभ बात॥
हँसि विनायक कहल फेर,
शुरु करू ई भारत।
बढ़ैत-बढ़ैत जे भेल जे,
महा-महा महाभारत॥
गणेशक गति अति तीव्र,
देखि व्यास कएल श्लोक जटिल।
श्लोकक भाष्य बूझि शीघ्र,
विघ्नकर्ता लिखल सकल।।

वैदिक प्रार्थना
ॐ संगच्छध्वं संवदध्यं संवो,
मनांसि जानताम~~
। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि
वः समानमस्तु वो मनो यथ वः सुसहासति॥

व्यास सुनाओल कंठस्थ कराओल,
पुत्र शुकदेव आ’ अन्य शिष्यकेँ।
देवगण सुनल नारदमुनिसँ,
गंधर्व राक्षस यक्ष सुनल शुकसँ॥
व्यास शिष्य वैशंपायन,
केलन्हि एकर प्रसार।
कहि सुनाओल यज्ञ बिच,
जे परीक्षित पुत्र जनमेजय कएल निस्तार॥
पौराणिक सूतजी रहथि,
तत मध्य।
करि ऋषिसभा नैमिषारण्यमे,
महर्षि शौनक अध्यक्ष॥
सूतजी कएल शुरु,
जयसंहिता-सतसहस्त्र।
भरत आ’ महाभारत,
ऋषि-गणक मध्य॥

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भालसरिक माला
1. शनैः-शनैः


परम शांति आऽ कि घोर कोलाहल। आरुणि ठाकुर किछु अस्वस्थ छथि आऽ कलकत्तामे वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि। अशांतिक क्षण हुनका रहि-रहि कय अनायासहि यादि आबि रहल छन्हि। जखन ओऽ अपन समस्या सभ अपन हित-संबंधी सभकेँ सुना कय अपन मोनक भार कम करैत रहथि। शनैः-शनैः समस्या सभ बढ़ैते चल गेल एतेक तक कि आब दोसरकेँ सुनेलापरांत मोन आर उचटि जाइत छलन्हि। ताहि द्वारे आब ओऽ अपने तक सीमित रहय लगलाह। हित संबंधी सभ बुझय लगलाह जे आरुणि समस्यासँ रहित भय गेल छथि।
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बच्चेसँ सपनामे भयावह चीज सभ देखाइ पड़ैत छलन्हि आरुणिकेँ। अखन धरि हुनका यादि छन्हि कोना आध-आध पहर रातिमे ओऽ घामे-पसीने भय जाइत रहथि आऽ हुनकर माता-पिता चिंतित भय बीयनि होकैत रहथि छलखिन्ह। पिताक-पिता आऽ तकर जन्मदाता के ? भगवान जौँ सभक पूर्वज तखन हुनकर पूर्वजके ? लोकसभ एहि प्रश्न सभकेँ हँसीमे उड़ा दैत छलाह, परंतु बादमे जखन आरुणि दर्शनशास्त्र पढ़लन्हि तखन हुनका पता चललन्हि जे एकर उत्तरक हेतु कतेक ऋषि-मुनि सेहो अप्पन जीवन समर्पित कय चुकल छथि मुदा ई प्रशन एखनो अनुत्तरिते अछि।
कख्ननोकेँ निन्दमे हुनका लागन्हि जे ओऽ घरक छत पर छथि आ’ नहि चाहितो शनैः-शनैः छतक बिना घेरल भाग दिशि गेल जा रहल छथि। गुरुत्वक कोनो शक्ति हुनका खीचि रहल छन्हि तावत धरि जावत ओऽ नीचाँ नहि खसि पड़ैत छथि। की ई छल कोनो प्रारब्धक दिशानिर्देश आऽकि कोनो भविष्यक दुर्घटनासँ बचबाक संदेश।

किछु दिन तकतँ आरुणि सुतबाक सही समयक पता लगबैत रहलाह परंतु शनैः-शनैः हुनका ई पता लागि गेलैन्ह जे स्वप्न आऽ निन्न एहि जीवनक दूटा एहन रहस्य अछि जे नियम विरुद्ध अछि आऽ अनुत्तरित अछि।
आऽ आरुणि पैघ भेलथि, फेर हुनकर पढ़ाइ शुरु कएल गेल- अगस्त्यक स्तोत्र- सरस्वति नमस्तुभ्यम वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भम् करिष्यामि सिद्धिर्भवतुमे सदा।
श्रीगणेषजीक अंकुश क संग गौरिशंकरक अभ्यर्थना सिद्धिस्तु। साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वसिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः सिद्धिःसाध्ये सतामस्तु प्रसदांतस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला।

एहि श्लोककेँ बजैत काल प्रायः आरुणि पशुपतिःपतिःक सामवेदीय तारतम्यक बाद अनायासहि हाऽ हाऽ कऽकय जोरसँ हँसय लगैत छलाह आऽ बीचहि मे रुकि जाइत छलाह। पिता सोचलखिन्ह जे कम वयसमे पढ़ाई शुरु केलासँ आरुणिक कुर्सी पर बैसि कय माथपर हाथ राखि कय बैसबाक आदतितँ खतम होयतन्हि।सय तकक खाँत ओऽ एके बेर मे सीखि गेलाह जखन ओऽ देखलन्हि जे बीसक बाद गणनामे पशुपतिःपतिःक जेकाँ लयबद्धता छैक।
मायक एकटा गप्प हुनका पसिन्न नहीं छलन्हि। ओऽ बिचमे गप्प करैत-करैत आरुणिक बातकेँ अनठिया दैत छलथिन्ह। एकबेर मायक क्यो संगी आयल छलीह। आरुणिक कोनो बातपर माय ध्यान नहीं दय रहल छलीह। आरुणिक हाथमे भरिघरक चाभीक झाबा छलन्हि तेँ ओऽ कहखिन्ह जे जौँ हुनकर बात नहीं सुनल जयतन्हि तँ ओऽ झाबाकेँ सोझाँअक डबरामे फेंकि देताह। माय सोचलखिन्ह जे हाँ-हाँ केलापर झाबा फेकियेटा देताह तैँ आर अनठिया देलखिन्ह। परिणाम दुनु तरहेँ एके हेबाक छल। चाभी बहुत खोज केलो पर नहि भेटल। एखनो घरक सभ अलमीरा आदिक चाभी डुप्लीकेट अछि। एतेक दिनक बाद ई सभ सोचि आरुणिक मुँहपर अनायासहि मुस्की आबि गेलन्हि।
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सिद्धांतवादी पिताकेँ नोकरीमे किछु ने किछु दिक्कत होइते रहैत छलन्हि ताहि द्वारे ओऽ आरुणि जल्दी सँ जल्दी पैघ देखय चाहैत छलाह। तेसर सँ सोझे पाँचम वर्गमे फनबा देल गेलन्हि।फेर भेल ई जे होलीक छुट्टीमे नियमानुसार सभ गोटे गाम गेल छलाह। नियम ई छल जे होली आऽ दुर्गापूजामे सभ बेर गाम जयबाक नियम जेकाँ छलैक। पिताजी सभकेँ छोड़ि कय वापिस भय गेलाह। फेर दरमाहा बन्द भय गेल छलन्हि प्राय़ःसे गाम चिट्ठी आयल जे आब सभकेँ गामहि मे रहय पड़तन्हि। मायतँ कानय लगलीह मुदा आरुणि खूब प्रसन्न भेलाह। मुदा सरकारी स्कूलमे ओहि समय वर्गक आगाँमे (नवीन) लगाकय एक वर्ग कममे लिखबाक गलत परम्परा नवीन शिक्षा नीतिक आलोकमे लेल गेल छलैक कारण नवीन नीतिमे आर किछुओ नवीन नहि छल। पिताजीकेँ जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओ’ तमसायलो छलाह आऽ एकर प्रतिकार स्वरूप पाँचम क्लासक बाद जखन ओऽ सभ शहर वापस अयलाह तँ आरुणिकेँ फेर एक वर्ग तरपाकय सोझे छठम वर्गक बदलामे सातम वर्गमे नाम लिखवा देलन्हि। छठम वर्गक विज्ञान आऽ गणितक पढ़ाइ पाँचमे वर्गमे कय लेबाक पिताक निर्देशक उद्देश्यक जानकारी आरिणिकेँ तखन जाकय भेलन्हि जखन प्रवेश-परीक्षामे यैह दुनु विषय पूछल गेल आऽ आरुणि छठा आऽ सातम दुनु वर्गक प्रवेश परीक्षामे बैसलाह आऽ सफल भेलाह। बहुत दिन बाद तक जखन क्यो आनो संदर्भमे छठम वर्गक चर्चा करैत छल तँ आरुणिकेँ किछु अनभिज्ञताक बोध होइत छलन्हि।

गामक प्रवासमे एकबेर आरुणि पिताकेँ चिट्ठी लिखने छलाह कारण हुनकर जुत्ता शहरेमे छूटि गेल छलन्हि। जुत्तातँ आबिये गेलन्हि संगहि चिट्ठीक तीन टा शाब्दिक गल्तीक विवरण सेहो आयल आऽ ईहो मोन पाड़ल गेल जे एकबेर दौरिकय गणितक प्रश्न हल करबाक प्रतियोगितामे तीनक बदला हड़बड़ीमे दुइयेटा प्रश्नकेँ हल कऽकय ओऽ कोना कॉपी जमा कय देने छलाह।
हुनकर स्वभावमे क्रोधक प्रवेश कखन भेलन्हि से तँ हुनको नहि बुझबामे अयलन्हि मुदा पिताजी हुनका क्रोधक समान कोनो दोसर रिपु नहि एहि संस्कृत श्लोकक दस बेर पाठ करबाक निर्देश देने छलखिन्ह- से धरि मोन छन्हि। एकटा घटना सेहो भेल छल जाहिमे स्कूलमे एकटा बच्चा झगड़ाक मध्य सिलेटसँ हुनकर माथ फोड़ि देने छलन्हि। आरुणि सेहो सिलेट उठेलथि मुदा ई सोचि जे ओकर माथ फूटि जयतैक हाथ रोकि लेने छलाह। एकर परिणामस्वरूप हुनकर पिता दू गोट काज केलन्हि। एकतँ हुनकर सिलेटकेँ बदलि कय लोहाक बदला लकड़ीक कोरबला सिलेट देलखिन्ह जकर कोनो ने कोनो भागक लकड़ी खुजि जाइत छलैक आऽ दोसर जे कॉलोनीमे समकक्ष अधिकारीक बैठक बजाकय कॉलोनीअहिमे स्कूल खोलि देल गेल जतय आरुणि पढ़य लगलाह। बादमे क्यो पंडित जखन वाल्मीकि रामायणक सुन्दरकाण्डक पाठ तँ क्यो ज्योतिष कँगुरिया आँगुरमे मोती आऽ कि मूनस्टोन पहिरबाक सलाह अही उद्देश्यक हेतु देबय लगैत छलाहतँ ओऽ संस्कृत श्लोक हुनका मोन पड़ि जाइत छलन्हि।

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बाल संस्कारक अंतर्गत सहायता माँगयमे आऽ समझौता करयमे अखनो हुनका असहजता अनुभव होइत छन्हि। मुदा हारि आऽजीत दुनुकेँ बराबड़ बूझि युद्ध करबाक विश्वास हुनकामे नहीं रहलन्हि विशेषकरिके पिताक मृत्युक बाद। आऽ विजय हुनकर लक्ष्य बनैत गेलन्हि शनैः-शनैः। जकर ओऽजी-जानसँ मदति कएलन्हि सेहो समयपर हुनकर संग देलकन्हि। समय-समय पर केल गेल समझौता सभ हुनकर संघर्षकेँ कम केलकन्हि। जतेकसँ दोस्तियारी छलैन्ह तकरे निभेनाइ मुश्किल भय रहल छलैन्ह। फेरतँ नव शहरमेँ नव संगीक हेतु स्थान नहि बचल।

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महत्वाकांक्षाक अंत नहि आऽ जीवन जीबाक कला सभक अद्वितीय अछि। आरुणि ई नाम आब कखनो-कखनो घरमे सुनाइ पड़ैत छल। कलकत्ता शहर प्रतिभाक पूजा करैत अछि। मुदा व्यवसायी होयबामे एकटा बाधा छल-अंग्रेजीक संग बाङलाक ज्ञान जे ओऽ बाट चलैत सीखि गेलाह।व्यस्त जीवनमे बीमारीक स्थितिअहिमे हुनका आराम भेटैत छलैन्ह। बीमारियेमे सोचबाक आदति मोन पड़ैत छलैन्ह। आऽ ई फ्लैट किनलाक बाद मायकेँ सेहो बजा लेलखिन्ह। ओना हुनका बुझल छलन्हि जे माय एहि सभसँ प्रभावित नहि होयतीह। कारण ओऽ अधिकारी प्त्नी छलीह आऽ पुत्रकेँसेहो ओहि रूपमे देखबाक कामना छलन्हि। ई नव शहर हुनक पुत्रक व्यक्तित्वमे सैद्धांतिकताक स्थानपर प्रायोगिकताक प्रतिशतता बढ़ा देने छलन्हि। आब समयाभावक कारण स्वास्थ्य खराब भेलेपरांत सोचबोक समय पुत्रकेँ भेटैत छलन्हि।
व्यसायमे सफलता प्राप्तिक पूर्व आरुणि एकटा कागज प्रिंटिंग प्रेसमे काज केनाइ शुरु केलन्हि। अपन मित्रवत प्रिंटिंग प्रेस मालिकसँ दरमाहाक बदला पर्सेंटेज पर काज करबाक आग्रह केलन्हि। ऑर्डर आनि बाइंडिंग आऽ प्रिंटिंग करबाबथि आऽ आस्ते-आस्ते अपन एकटा प्रिंटिंग प्रेस लगओलथि। किछु गोटे हिनका अहिठामसँ छपाइ करबाकय ग्राहककेँ बेचथि। हुनका जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओऽ एकटा चलाकी केलथि जे सभ बंडलमे अपन प्रेसक कैलेंडर धऽ देलखिन्ह। जखन अंतिम उपभोक्ताकेँ पता चललैक जे ओऽ सभ अनावश्यके दलालक माध्यमसँ समान कीनि रहल छलाह तँ ओऽ सभ सोझे आरुणि प्रिंटिंग प्रेसकेँ ऑर्डर देबय लागल। आरुणिकेँ घरमे अपन नाम कखनहुँ काले सुनि पड़ैन्ह। किताबक ऊपर छपल हुनकर नाम तँ कोनो कंपनीक छलैक- आऽ ओऽ ओकरासँ निकटता अनुभव नहि कऽ पाबि सकैत छलाह। संसारक कुचालि हुनकर पिताक अंत केने छलन्हि मुदा आरुणि व्यावसायिक युद्ध मस्तिष्कसँ लड़ैत आऽ जितैत गेलाह।
मायक एलाक बाद आरुणि ई नाम बीसो बेर दिन भरिमे सुनाइ पड़य लागल। ओकर संगी लोकनि उपरोक्त घटना सभकेँ जखन आरुणिक मायकेँ सुनबैत रहैत छलाह ई सोचि जे ओऽ अपन मित्रक बड़ाइ कय रहल छलाह तँ आरुणि असहजताक अनुभव करय लगैत छलाह आऽ गप्पकेँ दोसर दिशि मोड़ि दैत छलाह।
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हुनकर मायतँ जेना हुनक विवाहक हेतु आयल छलीह। माय जखन जिद्द ठानलन्हि तँ हुनका आश्चर्य भेलन्हि कारण घरमे जिद्दक एकाधिकारतँ हुनकेटा छलन्हि। मुदा माय बूझि गेल छलीहजे हुनकर बेटा प्रक्टिकल भय गेल छन्हि आऽ जिद्द केनाइ बिसरि गेल छन्हि। आरुणि सोचलन्हि जे छोटमे बड्ड जिद्द पूरा करबओने छथि तेँ आब पूरा कर्बाक समय आयल अछि। विवाह फेर बच्चा। माय अपन नैतमे पतिक रूप देखलैन्ह। पतिक मृत्यु बेटाकेँ प्रैक्टिकल बना देने छल मुदा आब ई नहीं होयत। कजे बेटा नहि कय सकल से आब नैत करत। नैतक नाममे बेटा आऽ पति दुहुक नामक समावेश केलन्हि-जयकलित आरुणि। फेर पढ़ाइ शुरु- सिद्धरस्तु-श्री गणेशजीक अंकुश आऽ वैह उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः। हुनकर बेटाकेँ पेशंट पढ़ेलखिन्ह ओऽ तँ घर सम्हारैत छलीह। आब पुतोहु घर सम्हारलैन्ह, बेटाकेँ तँ फुरसतिये नहि। आब बाऽ पढेतीह नैतकेँ।
उतपत्स्येत हिमम कोऽपि समानधर्मा कालोह्यम निरवधिर्विपुला च पृथ्वी।
पृथ्वी विशाल अछि आऽ काल निस्सीम,अनंत, एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहीं तँ काल्हि क्यो ने क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनायतऽ।

आरुणि अपनाकेँ अपन मायसँ दूर अनुभव केलन्हि, किछु अस्वस्थ सेहो छथि आऽ वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि।

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भालसरिक फूल

1.इच्छा-मृत्यु


हे भीष्म अहाँक कष्टक बखान,
सुनल छल खाइत पान-मखान,
मुदा बुझलहुँ नहि ई बात ,
ईच्छा-मृत्यु किए कै तात!
भीषणताक’ कथा नहि थोड़,
भूख,अत्यचार गरीब पर जोड़,
हरिजन शोलकन्ह थोड़हि-थोड़,
केलन्हि भयावह क्षत्रिय तोर,
घोषनि-ब्राह्मण सभ मोर,
केलन्हि रटन्ता विद्या तोर।
एक युधिष्ठिरपर छोरिकय राज,
छोड़ल अ’हाँ निसास।
हमर युधिष्ठिर पाँच सय चालीस,
पहिरथि खादी-रेशमी खालिस,
बुझल भीष्म हम आब ई बात,
पेलहुँ इच्छा-मृत्युएँ अहाँ निजात।
2.वार्ड नं 29 बेड नं. 32 सँ
सफदरजंग हॉस्पीटलसँ,
आइ देखल हम मीत,
डॉक्टर-पेशेंट फ्री इलाजक,
दंभ भरइ छथि,हा’ इष्ट।
साबुन-तेल सभपर टैक्स,
भरइ छथि सभ वासी,
लैटरीन गंदा अछि पुछने,
नर्स बिगरि देखबइ छथि
अपोलोक पगपाती।
जाऊ अपोलो गंदगी जौँ लागय,
टैक्सक बात फिनान्स मिनिस्टरेकेँ
जाऊ बूझाबय।
ई ब्लॉग किएक तँ विशिष्ट अछि, ताहि द्वारे संदेशकेँ सम्पादित कए, 5 जुलाई 2004सँ आइ धरि, एकर विस्तार कएल गेल अछि, नव-पोस्ट देलाक बदलामे एडिटिंग कए नीचामे एकरा बढ़ाओल जाइत छल। सन 2008 सँ एकर विस्तार बेशी नमगर भए जएबाक कारण रोकि देल गेल, किछु हीस काटलो गेल आ' नव-नव पोस्टिंग शुरू कएल गेल। 2006 मे सेहो पोस्टिँग कएल गेल मुदा फेर 2008 तक ओ' स्थगित रहल। ब्लॉगर केर यू.आर.एल. मे 2004/07/bhalsarik-gachh.html (भालसरिक-गाछ) सम्मिलित अछि, जे एकर मैथिली भाषामे होएबाक अकाट्य प्रमाण अछि।
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1 comment:

  1. भालसरिक गाछ भालसरिक गाछक चर्चा मैथिलीक ब्लॉगक इतिहासकेँ 4 जुलाई 2004 धरि पाचाँ लए गेल अछि। ई ब्लॉग मैथिलीक सभसँ पुरान ब्लॉग होएबाक दावा करैत अछि। यदि अहाँकेँ एहिसँ पुरान ब्लॉग केर विषयमे जानकारी अछि तँ ई दावा ggajendra@yahoo.co.in केँ सूचित करू।

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(c) २०००-२०२२ भालसरिक गाछ/ विदेह इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/, http://www.geocities.com/ggajendra , http://www.geocities.com/gajendrathakur/  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

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(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि तऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि

 

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