भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra   आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha   258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/   पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

 

(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

स्थायी स्तम्भ जेना मिथिला-रत्न, मिथिलाक खोज, विदेह पेटार आ सूचना-संपर्क-अन्वेषण सभ अंकमे समान अछि, ताहि हेतु ई सभ स्तम्भ सभ अंकमे नइ देल जाइत अछि, ई सभ स्तम्भ देखबा लेल क्लिक करू नीचाँ देल विदेहक 346म आ 347 म अंक, ऐ दुनू अंकमे सम्मिलित रूपेँ ई सभ स्तम्भ देल गेल अछि।

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Monday, July 21, 2008

विदेह वर्ष-1मास-1अंक-2 (15.01.2008)4.कथा 2.गंगा-ब्रिज

4.कथा
2.गंगा-ब्रिज

1995मे नवम्बरक महीना। केश कटायल मुँहेँ दरिभङ्गासँ पटनाक बस पर चढ़लहुँ।किछु किताब बेचिनहार अयलाह, तुक मिलेने सभ किताबक विशेषता कहि सुनओलन्हि।k खिस्सा-पिहानी,उपचार,फूलन-देवी सँ लय मनोहर पोथी तक सभ यात्रीगणकेँ एक-एक टा परसैत गेलाग।ओहिमे सँ किछु मोल-मोलाइ कएलाक उत्तर बिकयबो कएलन्हि आ’ सभटा वापस लय जाइत गेलाह,बससँ उतरैत कालकंडक्टरसँ वाद-विवाद सेहो भेलन्हि। फेर नेबोक रस निकालबाक यंत्रक आविष्कारक चढ़लाह,रस निकालि देखओलन्हि,खलासीसँ वाद-विवादक उपरांत ओहो उतरि गेलाह।फेर ककबा बला,पेन बला आ’ पेचकश बला सभ चढ़ि कय उतरैत गेलाह। पुछलाक उपरांत पता चलल जे गाड़ी साढ़े दस बजे खुजत ई गप्प बस बला झुट्ठे बाजल छल। पछुलका बसक सवारीकेँ सीट नहि भेटल छलन्हि, से बेशी अबेरो नहि होयत आऽ सीटो भेटि जायत,एहि तर्कक संग मार्केटिंगक उपकरणक रूपमे ई शस्त्र चलल छल।गाड़ी खुजबाक समय छल 11 बजे मुदा 11 बाजि कय पाँच मिनट धरि बहस होइत रहल जे घड़ीमे 11 बाजल अछि कि नहि।पाँछा एगारह बाजि कय दस मिनट पर जखन बादमे जायबला बसक कंडक्टर अशोक मिश्रा आऽ शाहीक बसक बीचक भिड़ंतक बात कय झगड़ा बजारि देलक-जे एको सेकेंड जौँ लेट होयत तँ’जे बुझु से’ भय जायत- तखन ड्राइवर अकस्माते हॉर्न बजाबय लागल।हमरा बगलक सीट पर बैसलि एकटा बूढ़ि बेटाकेँ जोरसँ बजाबय लगलीह,पाँच मिनट गरदमगोल होइत रहल।सभ यात्री चढ़ि गेलाह, आऽ दू-चारिटा यात्री जे अखने रिक्शासँ उतड़ल छलाह, जोर-जोरसँ बाजय लगलाह।पछुलका बस बला हुनकर मोटा-चोटा उठा कय अपना बसमे लऽ जाय चाहैत छलन्हि,मुदा ओऽ लोकनि पढ़ल लिखल छलाह आऽ हमरे सभक बससँ जाय चाहैत छलाह। ओऽ लोकनि दू-चारिटा चौधरी-कुँअरक नाम-गाम गनओलन्हि, तखन ओहि बस बलाकेँ बुझओलैक जे ई सभ फसादी लोक सभ अछि-से कहलक जे टू बाइ टूक बदला ओहि टू बाइ थ्री धक्कागाड़ीमे
ठाढ़े जयबाके जौँ इच्छा अछि तँ हम की करू-किरायो ओऽ एको पाइ कम नहि लेत। से दू-चारि गोट बेशी यात्री लेबाक मनसूबा पूरा भेलाक बाद ड्राइवर गाड़ी हाँकि देलक। ओहि रिक्शा-सभ परसँ एक गोट अधवयसू व्यक्ति चढ़ल छलाह आऽ संयोग ई भेल, जे हमर दोसर बगलमे बैसलव्यक्ति गुनधुन करैत छलाह जे फलनाँ बड़ा बूड़ि अछि,एखन धरि नहि आयल।गाड़ी खुजलाक बाद अगिला चौक पर असकसा कय ओऽ उतरि गेलाह,आऽ तकर बाद ओहि टू बाइ थ्री ग़ाड़ीक तीन सीट बला हीसमे हमरा बगलमे ओहि सज्जनकेँ जगह भेटि गेलन्हि।
हमर मोन स्थिर छल आऽ बेशी बजबाक इच्छा नहि छल। मुदा बगलगीर पहिने अप्पन भाग्यकेँ धन्यवाद देलन्हि,जकर प्रतापे हुनका सीट भेटलन्हि। पटनामे आवश्यक कार्य छलन्हि, तेँ लेट जायबला बससँ गेला उत्तर काजमे भाङठ पड़ितन्हि। फेर अप्पन परिचय असिस्टेंट डायरेक्टरक रूपमे देलाक उपरांत ई सूचना देलन्हि जे दरिभङ्गाक संग पटनोमे हुनकर मकान छन्हि। दुनू घर अप्पन पुरुषार्थसँ बनयबाक गप्पक संग,दुनू घरक दुमहला आऽ मारबल आऽ ग्रेनाइटसँ युक्त होयबाक बातो कहलन्हि। बजबैका लोक केँ सुनिनिहार लोक बड्ड पसिन्न पड़ैत छन्हि,से ओऽ हमरा पसिन्न करय लगलाह। तेँ पुछलन्हि-पटनामे अपनेक मकान कोन महल्लामे अछि।
हम कहलियन्हि-अप्पन मकान नहि अछि,किराया पर छी। पिताक मृत्युक उपरांत माँ केर मोन ओहि घरमे नहि लगतन्हि, ताहि हेतु ओऽ गामेमे रहि गेल छथि। आब पटना पहुँचि कय दोसर डेरा ताकब। हठात् एहि बातकेँ सुनि ओऽ हमर माथक केश दिशि ताकि कहलन्हि जे -ओऽ, आब बुझल।काटल केश देखि कय हमरा पहिनहिये जिज्ञासा करबाक चाही छल। पिताक क्रियाकर्मक हेतु गाम गेल छलहुँ। किछु कालक शांतिक पश्चात ओऽ सज्जन पनबट्टीसँ पान बहार

कय हमरासँ पुछलन्हि जे पान खाइत छी। हमर नहि- एहि उत्तरक पश्चात अप्पन विशेषज्ञता देखबैत कहलन्हि, जे हमतँ अहाँक दाँते देखि कय
बुझि गेल छलहुँ।पान खेलाक बाद अप्पन बेटी सभक सासुरक चर्चा कएलन्हि। बेटाक आइ.ए.एस. केर तैयारी करबाक गप्प कएलन्हि आऽ कोनो ग्रुपक चर्चा सेहो कएलन्हि जे विद्यार्थी लोकनिक बीच एहि तैयारीक हेतु तैयार भेल छल,आऽ ओहि ग्रुपमे प्रवेश मात्र प्रतिभावान लोकनिक हेतु सीमित छल। फेर आखिरीमे ईहो पता चलल जे ओहि प्रतिभावान ग्रुपक सदस्यता हुनकर पुत्रकेँ सेहो प्राप्त छन्हि। आँगा बढ़ैत-बढ़ैत गाड़ी एकटा लाइन होटल पर ठाढ़ भेल। किछु यात्री एकर विरोध कएलन्हि। एक गोटे कहलन्हि जे ई ड्राइवर-कंडक्टर खेनाइ खएबाक द्वारे एहि ग़टिया लाइन होटलमे गाड़ी रोकैत अछि। एकर सभक खेनाइ एतय मुफ्तिया छैक आऽ संगहि सूचना भेटल जे मुफ्तिया की रहतैक ओकर सभक बिल यात्रीगणसँ परोक्ष रूपमे लेल जाइत छैक आऽ बुझु जे एकर सभक बिल हमही सभ भरैत छी। हुनकर ईहो अपील छलन्हि जे क्यो गोटे नहि उतरय आऽ हारि कय बसकेँ स्टार्ट करय पड़तैक।किछु कालक उपरांत एकाएकी सभ गोटे उतरैत गेलाह आऽ ओऽ सज्जन सेहो खिसियायल उतरि प्राक भऽ ठाढ़ भय मिथिलांचलक दुर्दशाक कारणक व्याख्यामे हुनकर गप्प नहि मानबाक मनोवृत्तिकेँ सेहो दोषी करारि देलथिन्ह।
गाड़ी फेर खुजल आऽ किछु दूर आगू जा कय धक्काक संग ठाढ़ भय गेल। कंडक्टर कहलक जे सभ उतरैत जाऊ।गाड़ी पंक्चर भय गेल।लाइन होटल पर गाड़ी नहि रोकबाक अपील केनहार सज्जनक मत छलन्हि, जे लाइन होटल परजे गाड़ी ठाढ़ भेल, तखनेसँ जतरा खराब भए गेल अछि।आब आगू देखू की-की होइत अछि।नीचाँ उतरलाक बाद चारि-चारि,पाँच-पाँच गोटेक गोला बनि गेल।ई जगह प्रायः वैशालीक आसपास छल। एक गोटे खेतक विस्तारक दिशि ध्यान देलन्हि।घर सभक ऐल-फैल होयबाक सेहो चर्चा भेल।संगहि अपना सभक गाम दिशि घर पर घर आऽ
चाड़ पर चाड़ चढ़ल रहैत अछि-आऽ से झगड़ाक कारण अछि अहू पर चर्चा भेल। हमर बगलमे बैसल अधवयसू व्यक्ति किछु औंघायल सन छलाह, मुदा एहि व्यवधानसँ हुनकर भक्क टूटि गेलन्हि। हुनकर बकार
लाइन होटल पर आकि नीचाँ ठाढ़ भेला पर मन्द भय जाइत छलन्हि से हम अनुभव कएलहुँ। फेर बस चलि पड़ल आ ऽ ओऽ सज्जन पुनः शुरू भय गेलाह। हाजीपुर शहर अएला पर तँ हुनक स्मृति आर तीक्ष्ण भय गेलन्हि।किछु काल बस चललतँ एकटा कॉलोनीक दिशि इशारा कय ओऽ कहलन्हि- ई छी गंगा ब्रिज कॉलोनी,की छल आऽ आब की भय गेल अछि। एक भागमे रहबाक हेतु क्वॉर्टर आऽ दोसर भागमे गिट्टी-छड़-सीमेंट सभ भड़ल रहैत छल। आबतँ कॉलोनीक मेंटेनेंसो नहि भय रहल अछि। हम चौँकि गेलहुँ। कहलियन्हि, एतय एकटा स्कूलोतँ छल। ओ ऽ सोझाँ एशारा दैत देखेलन्हि- देखू, ओतय नामो लिखल अछि। बरखा बुन्नीमे नाम अदहा-छिदहा मेटा गेल अछि। फेर ओ ऽ चौँकि कय पुछलन्हि-अहाँकेँ कोना बुझल अछि। -हम एहि स्कूलमे पढ़ने छी। -मुदा एहि कॉलोनीमे तँ गंगा पुल निर्माणक अभियंता लोकनि मात्र रहैत छलाह आऽ स्कूलमे हुनके बच्चा सभकेँ पढ़बाक हेतु एहि स्कूलक निर्माण भेल छल। -हम सभ अही कॉलोनीमे रहैत छलहुँ। -अहाँक पिताक नाम की छी। -श्री कृपानन्द ठाकुर। पिताक मृत्यु पंद्रह दिन पहिनहि भेल रहन्हि से स्वर्गीय कहबाक हिस्सक नहि पड़ल छल।
-अहाँ ठाकुरजीक पुत्र छी। ई कहि हमरा दिशि ओ ऽ अपनत्वसँ बेशी ममत्वक दृष्टि देलन्हि। -अहाँक नाम की छी।

-आइ.ए.आजम।ओ ऽ कहलन्हि। तखन हम हुनका सभटा बच्चाक नाम गना देलियन्हि। हुनकर एकटा बेटा नेहाल आजम हमर क्लासमे पढ़ैत छल। आब हुनकर स्वर
बदलि गेलन्हि। -कॉलोनीमे दू गोटे खूब पूजा करैत छलाह।एकटा पाण्डे जी आऽ दोसर अहाँक पिताजी। पाण्डेजीतँ पूजाक संग पाइयो कमाइत छलाह।मुदा अहाँक पिताजी छलाह पूर्ण ईमानदार आ ऽ दयालु।चंदा कय होम्योपैथिक दवाई कानपुरसँ अनैत छलाह, आ ऽ मुफ्त इलाज कॉलोनीबलाकेँ दैत छलाह। हमर बेटीकेँ माथमे बड़का गूर भय गेल छलैक।कोनो एलोपैथिक बलासँ ठीक नहि भेल छलैक। अहींक पिताजी ओकरा ठीक केने छलखिन्ह। इंजीनियर रहितहुँ होम्योपैथीक डिग्री हुनका रहन्हि। ड्राइंग रूममे होम्योपैथीक छोट-पैघ, सादा-रंगीन शीशी सभ हमरा आँखिक सोझाँ आबि गेल। -आइ काल्हि कतय पोस्टेड छथि।बहुत दिनसँ सम्पर्के टूटि गेल।एतुक्का बाद कतहु संगे पोस्टिंग सेहो नहि रहल।बुझू भेँट भेना पन्द्रह सालसँ ऊपर भय गेल अछि। -पन्द्रह दिन पहिने हुनकर मृत्यु भय गेलन्हि। हमर कटायल केश दिशि देखि ओ ऽ कहलन्हि-हमरे सँ गल्ती भेल। केश कटेने देखियो कय नहि पुछलहुँ। तेँ अहाँ भरि रस्ता गुम्म छलहुँ। फेर कहय लगलाह- मजदूरक प्रति बड्ड चिंता रहैत छलन्हि।तावत बस गंगा पुल पर आबि गेल छल।आगाँ फाटक पर बसकेँ टिकट कटेबाक हेतु ठाढ़ कय देल गेलैक। क्यो गोटे संवादो देलक जे आगू वन-वे जेकाँ अछि। एक कातमे रिपेयरिंग चलि रहल अछि।हमर आगाँ दृश्य घूमि गेल।एहि पुलक निर्माणकालक पाया सभ।कॉलोनीक टूटल देबालक पजेबा सभ।ओऽ देबाल सभ साल टूटैत छल।पिताजी कहैत छलाह जे एंजीनियर आऽ ठेकेदार सभ मिलल अछि। फेर मोन पड़ल सूटकेस भरल रुपैय्या। हमर पिताजी एक लात मारने छलाह आऽ सूटकेस दूर फेका गेल। एक

गोट पितयौत भाय रहैत छलाह-से सभटा रुपैय्या ओहि सूटकेसमे राखि ओहि ठिकेदारकेँ देलन्हि। माँ हमरा सभकेँ भितरिया कोठली दिशि लय गेलीह। एक बेर पिताजी पुलक पाया सभक लग स्टीमरसँ लय गेल छलाह आ ऽ कहलन्हि जे देखू।एहि पायाक निर्माणमे कतेक गोट मजदूर ऊपरसँ
घिरनी जेकाँ नाचि कय गंगामे खसि पड़ल। सयसँ ऊपर।कतेक हमरा आँखिक सोझाँ। ओहिमेसँ मात्र किछुए परिवारकेँ कंपेनसेशन देल गेलैक। आन सभक ने लिस्टमे नाम छैक, ने क्यो पता लगेलकैक।तैयो सभ अभियंता लोकनि ठिकेदारसँ मिलल अछि।
भक्क टूटल।बससँ उतरि ओहि पुलक निर्माणमे शहीद मजदूरक लिस्ट देखलहुँ।बहुत कम लोकक नाम छल-प्रायः बिन कंपेंनसेशन बलाक नाम नहि रहैक। बस शुरू होयबाक सूरसार कएलक तँ हम आ ऽ आजम साहब बस पर धड़फड़ा कय चढ़लहुँ।
ओ ऽ पुनः बाजय लगलाह।-अहाँ कहलहुँ जे किराये पर रहैत छी। बुझू। तीस बरख पी.डबल्यु.डी. मे ईमानदारीसँ कार्य कएलाक उत्तर एकटा घरो नहि बना सकलाह। लोक की-की नहि कए गेल।हमहुँ 1981 क बाद अहींक पिताजीक लाइन पर चलय लगलहुँ।दू टा घरो जे बनयने छी से नामे-मात्रक दू-महला।अधखिज्जू-ऊपरमे एक-एकटा कोठली अछि। अहाँक पिताकेँ की देलकन्हि सरकार। आ ऽ की भेटलन्हि।रिटायरमेण्टक पहिनहि मृत्यु। ने कोनो सम्मान।पुलक उद्घाटन पर दू-दू हजार सभ अभियंताकेँ सरकार देलक। ओ ऽ तँ भगवानक रूप छलाह।सम्मानक लालसाक हेतु काज नहि कएलन्हि।सभ वर्क्स डिवीजनमे जयबाक हेतु पैरवी करय आ ऽ ई नन-वर्क्समे जयबाक हेतु पैरवी करथि। फेर ओ ऽ हमरासँ पुछलन्हि जे अहाँ की करैत छी।आ ऽ ई जनला पर जे दरिभङ्गामे हम नोकरी करैत छी आ ऽ पिता,माय आ ऽ भाय पटनामे रहैत छलाह, हमरासँ कहलन्हि।-दरभंगोमे आऽ पटनो मे आउ। मायोकेँ अनियन्हु।हमर पत्नीकेँ बड्ड नीक लगतन्हि। नेहालतँ पटनेमे अछि। फेर अपन पटना आ ऽ दरभंगा दुनू

ठामक पता अपन स्नेहिल हाथसँ पड़बैत पटनाक हार्डिंग पार्क बस स्टैण्ड पर उतरलाह। बाहरसँ पटना अयला पर होर्डिंगकेँ देखि हम प्रसन्न भय जाइत छलहुँ।मुदा पिताक छयाक दूर भेलाक बाद आब एहि नगरसँ लगाव नहि प्रतियोगिता करय पड़त हमरा।
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(c) २०००-२०२२ भालसरिक गाछ/ विदेह इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/, http://www.geocities.com/ggajendra , http://www.geocities.com/gajendrathakur/  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

स्थायी स्तम्भ जेना मिथिला-रत्न, मिथिलाक खोज, विदेह पेटार आ सूचना-संपर्क-अन्वेषण सभ अंकमे समान अछि, ताहि हेतु ई सभ स्तम्भ सभ अंकमे नइ देल जाइत अछि, ई सभ स्तम्भ देखबा लेल क्लिक करू नीचाँ देल विदेहक 346म आ 347 म अंक, ऐ दुनू अंकमे सम्मिलित रूपेँ ई सभ स्तम्भ देल गेल अछि।

 

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