भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

भालसरिक गाछ/ विदेह- इन्टरनेट (अंतर्जाल) पर मैथिलीक पहिल उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि।  भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra   आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html   लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha   258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै। इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे http://www.videha.co.in/   पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

 

(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

स्थायी स्तम्भ जेना मिथिला-रत्न, मिथिलाक खोज, विदेह पेटार आ सूचना-संपर्क-अन्वेषण सभ अंकमे समान अछि, ताहि हेतु ई सभ स्तम्भ सभ अंकमे नइ देल जाइत अछि, ई सभ स्तम्भ देखबा लेल क्लिक करू नीचाँ देल विदेहक 346म आ 347 म अंक, ऐ दुनू अंकमे सम्मिलित रूपेँ ई सभ स्तम्भ देल गेल अछि।

“विदेह” ई-पत्रिका: देवनागरी वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मिथिलाक्षर वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मैथिली-IPA वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मैथिली-ब्रेल वर्सन

 VIDEHA_346

 VIDEHA_346_Tirhuta

 VIDEHA_346_IPA

 VIDEHA_346_Braille

 VIDEHA_347

 VIDEHA_347_Tirhuta

 VIDEHA_347_IPA

 VIDEHA_347_Braille

 

Monday, July 28, 2008

'विदेह' १ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १३ )१. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’नो एंट्री : मा प्रविश

१. नाटक
श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे। १९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आऽ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर।
नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि-अंकीय मैथिली नाटक)
नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।)
तेसर कल्लोलक दोसर खेप जारी....विदेहक एहि तेरहम अंक 01 जुलाई २००८ सँ।
नो एंट्री : मा प्रविश

तेसर कल्लोल दोसर खेप

[ई बात कहैत देरी जेना ‘भगदड़’ मचि जाइत अछि आ पुनः सब क्यो कुर्सी पर सँ उठि-उठि के कतार मे जुटि जैबाक प्रयास करैत छथि। क्यो-क्यो सबटा कुर्सी केँ तह लगैबाक प्रयास करैत अछि त’ क्यो सबटाकेँ मंचक एक कात हँटा कए कतारक लेल जगह बनैबा मे जुटि जाइत अछि....क्यो हल्ला - गुल्ला आरंभ क’ दैत छथि। नेताजी माईक पर सँ “हे, सुनै जाउ” “शांत भ’ जाउ” आदि कहै छथि, मुदा हुनकर बात सभक हल्ला - गुल्ला मे जेना डूबि जाइत छनि। दुनू अनुचर नेताजीक देखा-देखी कैक गोटे केँ समझाबै - बुझाबैक प्रयास करै छथि, मुदा क्यो नहि तैयार छथि हिनका दुनूक बात मानै लेल। कनेके देर मे मंच पर सँ सब किछु हँटि जाइत अछि आ पुनः एकटा कतार बनि जाइत अछि..... पुनः प्रथमे दृश्य जकाँ कतहु-कतहु जेना संघर्ष चलि रहल होइक गुप्त रूप सँ। भाषणक मंच पर मात्र तीन गोटे छथि—बीच मे अभिनेता, बामा दिसि वामपंथी युवा, आ अभिनेताक दक्षिण दिसि बदरी बाबू.... चारू मृत सैनिक पुनः कतारक लग ठाढ़ छथि। मात्र रमणी- मोहन, महिला आ चोर छथि मंचक बीचो-बीच, सबटा अवाक् भ’ कए देखैत।]

महिला : (चोर सँ) हे, अहाँ सभक एत’ ‘लेडीज’ सभक लेल अलग ‘क्यू’ नहि होइ छैक ?
चोर : अलग ‘क्यू’ ?
रमणी-मोहन : हँ-हँ, कियै नञि ? अहाँ की एकरा सभक संग धक्का-मुक्की करब ? (महिलाक हाथ ध’ कए) आउने—(एकटा पृथक क्यू बनबैत) अहाँ एत’ ठाढ़ भ’ जाउ वी.आई.पी. क्यू थिकै... जेना मंदिर मे नञि होइ छइ ?
चोर : वी. आइ. पी.... एतहु ?
वामपंथी : (भाषण मंच पर सँ उतरैत छथि) बात त’ ई ठीके बजलाह।
अभिनेता : (अधिकतर फुर्ती देखबैत वी.आई.पी. क्यू मे ठाढ़ होइत) ई त’ पृथ्वीक मनुक्खक लेल नव बात नहिये थिक... (चोरसँ) तैं एहिमे आश्चर्य कियै भ’ रहल छह ?

[तावत नेता, हुनक दुनू अनुचर आ वामपंथी युवा मे जेना स्पर्धा भ’ रहल होइक जे के, वी. आई.पी. क्यू मे पहिने ठाढ़ हैताह। एकटा अनुचर रमणी-मोहनकेँ पकड़ि कए “हे ...अहाँ ओत’ कोना ठाढ़ छी”? कहैत वी. आई. पी. क्यू केर पाछाँ आनि कए ठाढ़ क’ दैत छथि। अभिनेता आ महिला आपस मे गप-शप आ हँसी मजाक करै लागैत छथि। रमणी-मोहन मूड़ी झुकौने क्यू केर अंत मे ठाढ़ रहैत छथि। वामपंथी युवा छलाह अभिनेताक पाछाँ ठाढ़, हुनकर पाछाँ बदरी बाबू आ एकटा अनुचर—जे बदरी बाबूक हाथ आ पीठ मे आराम द’ रहल छल। आ दोसर अनुचर ठीक क’ नेने छल- अपनहि मोने जे दोसर क्यू –साधारण मनुक्ख बाला- तकर देख-रेखक दायित्व तकरे पर छैक। तैं ओहि क्यू मे असंतोष आ छोट-मोट झगड़ा केँ डाँटि-डपटि कए ठीक क’ रहल छल। आ हठात् मंच पर एहि विशाल परिवर्तनक दिसि अवाक भ’ कए देखैत चोर कोनो क्यू मे ठाढ़ नहि रहि कए भाषण-मंचक पासे सँ दुनू कतार दिसि देखि रहल छल।
यम आ पाछू-पाछू चित्रगुप्त प्रवेश करैत छथि। युवक हाथमे एकटा दंड आ माथ पर मुकुट, परिधेय छलनि राजकीय, हाव-भाव सँ दुनू कतार मे जेना एकटा खलबली मचि जाइत अछि। कतेको गोटे “हे आबि गेलाह” वैह छथि, “हे इयैह त’ थिकाह !” आदि सुनल जा रहल छल। चित्रगुप्तक हाथमे एकटा मोट पोथा छलनि जे खोलि-खोलि कए नाम-धाम मिला लेबाक आदति छलनि हुनकर। यमराज प्रविष्ट भ’ कए सर्वप्रथम साधारण मनुक्खक कतार दिसि देखैत छथि आ जेना एक मुहूर्तक लेल ओत’ थम्हैत छथि। सब क्यो शांत भ’ जाइत अछि- सभक बोलती बंद—जे अनुचर कतार केँ ठीक क’ रहल छल—ओहो साधारण मनुक्खक कतारक आगाँ दिसि कतहु उचक्के लग घुसिया कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि। यमराज पुनः आगाँ बढ़ैत छथि त’ वी. आई. पी. कतारक पास आबै छथि—ओत’ ठाढ़ सब गोटे हुनका नमस्कार करैत छथि। वामपंथी युवा अभिनेता सँ पूछैत छथि “ई के थिकाह ?” उत्तर मे अभिनेता जो किछु कहैत छथि से पूर्ण रूपसँ स्पष्ट त’ नहि होइछ मुदा दबले स्वरेँ बाजै छथि “चिन्हलहुँ नहि ? “ईयैह त’ छथि यमराज !” वामपंथी युवा घबड़ा कए एकटा लाल सलाम ठोकि दैत छथि आ पुनः नमस्कार सहो करै लागैत छथि। यमराज हिनकर सभक उपेक्षा करैत चोरक लग चलि आबै छथि भाषण मंचक लग मे।]

यमराज : (चोर सँ) अहाँ एतय कियै छी महात्मन् ! (हुनक एहि बात पर, विषेशतया ‘महात्मन् !’ एहि संबोधन सँ जेना दुनू कतार मे खलबली मचि जाइत अछि। एतबा धरि जे चारू मृत सैनिक सँ ल’ कए सब क्यो एक दोसरा सँ पूछै लागैत छथि....“महात्मन् ?” “महात्मा कियैक कहलाह ई ?” “ई सत्ये महात्मा थिकाह की ?” “ई की कहि रहल छथि ? ” त’ क्यो-क्यो उत्तर मे… “पता नहि !” ने जानि कियैक...। भ’ सकैछ… आदि,आदि बाजै लागैत छथि। परिवेश जेना अशांत भ’ जाइत अछि यमराज असंतुष्ट भ’ जाइत छथि) आ ! की हल्ला करै जाइ छी सब ? देखि नहि रहल छी जे हिनका सँ बात क’ रहल छी ? (हुनकर डाँट सुनि दुनू अनुचर ठोर पर आङुर धैने “श्-श्-श्-श् !” आदि कहैत सब केँ चुप कराबैत अछि। हठात् जेना खलबली मचल छलैक तहिना सब क्यो चुपचाप भ’ जाइत छथि।)
चोर : (विह्वल भ’ कए) महाराज !
यमराज : (चोर दिसि घुरैत) हूँ त’ हम की कहि रहल छलहुँ ? (उत्तरक अपेक्षा छनि चित्रगुप्त सँ)
चित्रगुप्त : प्रभु, अपने हिनका सँ आगमनक कारण पूछि रहल छलियनि...
यमराज : (मोन पड़ैत छनि) हँ ! हम कहै छलहुँ (चोर सँ) अहाँ एत’ कियैक ?
चोर : (घबड़ाइत) नञि महाराज, हम त’ कतारे मे छलहुँ....सब सँ पाछाँ... ओ त’ एत’ राजनीति केर बात चलि रहल छल ... आ नेताजी लोकनि आबि गेल छलाह तैं....
यमराज : (आश्चर्य होइत) ‘राजनीति’? ‘नेताजी’? माने ?

(नेताजी घबड़ाबैत गला खखारैत कतार सँ बहिरा कए आगाँ आबि जाइत छथि। पाछाँ-पाछाँ थरथरबैत दुनू अनुचर सेहो ठाड़ भ’ जाइत छथि।)
नेता : (बाजबाक प्रयास करैत छथि साहस क’ कए मुदा गला सँ बोली नहि निकलैत छनि) जी… हम छी ‘बदरी-विशाल’!
चोर : इयैह भेला नेताजी !
(तावत वामपंथी युवा सेहो अगुआ आबै छथि।) आ ईहो छथि नेताजी--- मुदा रंमे कने लाल !
चित्रगुप्त : (मुस्की लैत) हिनकर रंग लाल त’ हुनकर ?
(नेताजी केँ देखाबैत छथि)
चोर : ओ त’ कहैत छथि ‘हरियर’ मुदा...
चित्रगुप्त : (जेना सत्ये जानै चाहै छथि) मुदा ?
चोर : जे निन्दा करै छइ से कहै छइ रंग छनि ‘कारी’!
नेता : नञि, नञि....हम बिल्कुल साफ छी, महाराज, बिल्कुल सफेद....
वामपंथी : (तिर्यक दृष्टिएँ नेता केँ दैखैत) ने ‘हरियर’ छथि आ नञि ‘कार’.... मुदा छनि हिनकहि सरकार ! (अंतिम शब्द पर जोर दैत छथि नेताजी क्रोधक अभिव्यक्ति केँ गीड़ि जाइत छथि)
चित्रगुप्त : बुझलहुँ—ई छथि नेता सरकार, अर्थात् ‘नायक’ आ (अभिनेता केँ देखा) ई छथि ‘अभिनेता’ अर्थात् ‘अधिनायक’ आओर अहाँ छी....
नेता : (वाक्य केँ समाप्त नहि होमै दैत छथि) खलनायक !
(यमराज केँ छोड़ि सभ क्यो हँसि दैत छथि हँसीक धारा कम होइत बंद भ’ जाइत अछि जखन यमराज अपन दंड उठा इशारा करैत छथि सब शांत भ’ जाइत छथि।)
यमराज : (आवाज कम नहि भेल अछि से देखि) देखि रहल छी सब क्यो जुटल छी एत’—नेता सँ ल’ कए अनु-नेता धरि...
चोर : उपनेता, छरनेता, परनेता - सब क्यो !
यमराज : मुदा ई नहि स्पष्ट अछि जे ओ सभ कतार मे ठाढ़ भ’ कए एना धक्का-मुक्की कियै क’ रहल छथि।
अनुचर 1 : (जा कए घेंट पकड़ि कए पॉकिट-मार केँ ल’ आनैत छथि—पाछाँ-पाछाँ उचक्का अहिना चलि आबैत अछि) हे हौ ! बताबह-- कियैक धक्का-मुक्की क’ रहल छह ?
पॉकिट-मार : हम कत’ धक्का द’ रहल छलहुँ, हमरे पर त’ सब क्यो गरजैत-बरसैत अछि।
[तावत यमराज (अपन चश्मा पहिरि कए) चित्रगुप्तक खाता केँ उल्टा-पुल्टा कए दैखै चाहैत छथि—अनुचर दुनू भाग- दौड़ कए कतहुँ सँ एकटा ऊँच टूल आनि दैत छथि । टूल केँ मंचक बाम दिसि राखल जाइछ, ताहिपर विशालाकार रजिष्टर केँ राखि कए यमराज देखब शुरू करै छथि। नंदी-भृंगी अगुआ कए हुनक सहायताक लेल दुनू बगल ठाढ़ भ’ जाइत छथि—अनुचर-दुनू केँ पाछाँ दिसि धकेलि कए। नहि त’ अनुचर द्वय केँ मोन छलैक रजिष्टर मे झाँकि कए देखी जे भाग मे की लिखल अछि। मुदा धक्का खा कए अपन सन मुँह बनबैत पुनः नेताजीक दुनू दिसि जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज अपन काज करै लागैत छथि। हुनका कोनो दिसि ध्यान नहि छनि। नंदी अपन जेब सँ एकटा तह लगायल अथवा ‘रोल’ कैल कागज केँ खोलैत छथि आ जेना अपनहि तीनू मे एक-एक क’ कए नाम पढ़ि रहल छथि एत’ उपस्थित लोग सभक आ भृंगी रजिष्टरक पन्ना उल्टाबैत वर्णानुक्रमक अनुसार ओ नाम खोलि कए बहार करैत छथि—तखन यमराज ‘रिकार्ड’ केँ पढ़ै छथि, हिनका तीनू केँ आन कोनो दिसि ध्यान नहि छनि।]

चित्रगुप्त : मुदा ई त’ बताऊ- ओना ओत’ कतार बना कए ठाढ़ कियै छी ?
पॉकिट-मार : हुजूर स्वर्ग जाय चाहै छी....
उचक्का : ई ! लुच्चा नहितन, मोन भेल त’ ‘चलल मुरारी हीरो बनय’.... स्वर्ग जैताह...मुँह त’ देखू !
चित्रगुप्त : (थम्हबैत) जाय दियन्हु हिनकर बात... मुदा ई बताऊ—एत’ कतारक तात्पर्य की ?
चोर : नञि बुझलहुँ...कतार लगायब त’ हमर सभक आदतिये बनि गेल अछि..
पॉकिट-मार : (उचक्का दिसि दैखबैत) आ कतार तोड़ब सेहो....
नेताजी : (जेना आब फुरलनि) ई सब त’ हमर सभक सभ्य समाजक नियमे बनि गेल अछि... धीरज धरी, अपन बेरी आबय तखने अहाँ केँ सेवा भेटत...
अनुचर 1 : चाहे ओ रेलक टिकट हो...
अनुचर 2 : चाहे बिजली-पानिक बिल...
चोर : कतहु फोन करू त’ कहत “अब आप क्यू में हैं”... आ कि बस बाजा बजबै लागत... (पॉकिट-मार टेलिफोनक ‘कॉल होल्डिंग’ क कोनो सुर केँ मुँह सँ बजा दैत छथि।)
चित्रगुप्त : मुदा एत’ कोन सेवाक अपेक्षा छल ?
नेताजी : माने ?
चोर : नञि बुझलियैक ?
अनुचर 1 : अहाँ बुझल ?
अनुचर 2 : जेना ई सब बात बुझै छथि !
चोर : सब बात त’ नहिये बुझै छी—मुदा ई पूछि रहल छथि, एत’ कोन लड्डू लेल कतार मे ठाढ़ छी अहाँ सभ ?
चित्रगुप्त : हम सैह जानै चाहै छलहुँ... कोन बातक प्रतीक्षा करै छलाह ई सब गोटे ?
चोर : (अनुचर 1 केँ) अहाँ बताउ ने कियैक ठाढ़ छलहुँ ?
अनुचर 1 : (तोतराबै लागै छथि) हम..माने...
चोर : (अनुचर 2 सँ) अच्छा त’ अहीं बताउ.... कथी लेल ठाढ़ छी एत’ क्यू मे...?
अनुचर 2 : सब क्यो ठाढ़ छथि तँ हमहूँ ...
अनुचर 1 : हमर सभक महान नेता बदरी बाबू जखन कतार मे ठाढ़ रहि कए प्रतीक्षा क’ सकै छथि, तखन हम सब कियैक नहि ?
चित्रगुप्त : (हुनक बात केँ समाप्त होमै नहि द’ कए) मुदा प्रतीक्षा कथीक छलनि ?
चोर : किनकर प्रतीक्षा ?...सेहो कहि सकै छी !
पॉकिट-मार : ई सब त’ कहै छलाह—रंभा—संभा...
चोर : (हँसैत) धत् ! मेनका रंभा, उर्वशी...(हँसैत छथि)
चित्रगुप्त : ओ ! त’ प्रतीक्षा करै छलहुँ कखन दरबज्जा खुजत आ
अप्सरा सबटा अयतीह ? (हँसैत छथि।)
नेता : (प्रतिवादक स्वरमे) नहि-नहि... हम सब त’ इयैह प्रतीक्षा क’ रहल छलहुँ जे...
अनुचर 1 : .....कखन अपने लोकनि आयब...
अनुचर 2 : .....आ कखन स्वर्गक द्वार खुजत....
नेता : आ कखन ओ घड़ी आओत जखन हम सब स्वर्ग जा’ सकब !

[कहैत-कहैत मंचक परिवेश स्वपनिल बनि गेल आ कैकटा नृत्यांगना/अप्सरा नाचैत-गाबैत मंच पर आबि जाइत छथि.... नृत्य-गीतक संगहि धीरे-धीरे अन्हार भ’ जाइछ।]
(क्रमश:)
(c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।

No comments:

Post a Comment

(c) २०००-२०२२ भालसरिक गाछ/ विदेह इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थिति

(c) २०००-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/, http://www.geocities.com/ggajendra , http://www.geocities.com/gajendrathakur/  आदि लिंकपर  आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html  लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha  258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/  भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर  मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/  पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

स्थायी स्तम्भ जेना मिथिला-रत्न, मिथिलाक खोज, विदेह पेटार आ सूचना-संपर्क-अन्वेषण सभ अंकमे समान अछि, ताहि हेतु ई सभ स्तम्भ सभ अंकमे नइ देल जाइत अछि, ई सभ स्तम्भ देखबा लेल क्लिक करू नीचाँ देल विदेहक 346म आ 347 म अंक, ऐ दुनू अंकमे सम्मिलित रूपेँ ई सभ स्तम्भ देल गेल अछि।

 

“विदेह” ई-पत्रिका: देवनागरी वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मिथिलाक्षर वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मैथिली-IPA वर्सन

“विदेह” ई-पत्रिका: मैथिली-ब्रेल वर्सन

 VIDEHA_346

 VIDEHA_346_Tirhuta

 VIDEHA_346_IPA

 VIDEHA_346_Braille

 VIDEHA_347

 VIDEHA_347_Tirhuta

 VIDEHA_347_IPA

 VIDEHA_347_Braille

 

 

(c)२०००-२०२२. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि तऽ संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: डॉ उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक -स्त्री कोना- इरा मल्लिक।

रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि,'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत।  एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि

 

(c) २००४-२०२२ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/, http://www.geocities.com/gajendrathakur/ आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA

Search This Blog

विदेह फाइल

विदेह ई-पत्रिका ई पत्र द्वारा : Videha RSS Feed

मान्यवर, विदेहक नव अंक ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू- http://www.videha.co.in/ Home विदेह नूतन अंक संपादकीय संदेश विदेह नूतन अंक गद्य विदेह नूतन अंक पद्य विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती विदेह नूतन अंक बालानां कृते विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना लेखन VIDEHA NON RESIDENT MAITHILS VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT TUTOR VIDEHA ARCHIVE Videha ejournal all the old issues in Tirhuta and Devanagari versions विदेह मिथिला रत्न विदेह मिथिलाक खोज विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे (c)२००४-०९.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। 'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। विदेह आर्काइव गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (1200 वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू स्तंभ 'मिथिलाक खोज' भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प।मिथिलाक रत्न लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' स्तंभमे देखू। Videha Ist Maithili Language Fortnightly e Journal at http://www.videha.co.in/ विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha ejournal all the old issues in Braille, Tirhuta and Devanagari versions (c)2004-17.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: राम वि‍लास साहु, नन्द विलास राय, सन्दीप कुमार साफी आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। सम्पादक- नाटक-रंगमंच-चलचित्र- बेचन ठाकुर। सम्पादक- सूचना-सम्पर्क-समाद- पूनम मंडल। सम्पादक- अनुवाद विभाग- विनीत उत्पल।
रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार ऐ ई-पत्रिकाकेँ छैै, आ से हानि-लाभ रहित आधारपर छै आ तैँ ऐ लेल कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह।। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। वि दे ह विदेह Videha বিদেহhttp://www.videha.co.in/ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

पहिल मैथिली ब्लॉगक आर्काइव